मंगलवार, 27 सितंबर 2016

संस्कार

लौंडों ने संस्कार के नाम पे बस इतना ही पाया है कि अपने पैसे से खरीदे हुए आइटम के दाम भी बाप को आधा करके बताते हैं, वो भी सिर्फ पूछने पर.. 


जिंदगी के फंडे

जिंदगी के फंडे उस दिन क्लियर हो जाते हैं, जिस दिन किसी देह का पोस्ट मोर्तेम होता देख लो, स्वाद की दीवानी जीभ शांत रहती है.. भोजन का संचय करती वही कुछ अंतड़ियाँ निष्ठुर सी जो बाहर निकाल दी जाती हैं, आज-कल-कैरियर-बैंक-बैलेंस से अनभिज्ञ ठगा सा मृत मष्तिस्क, जो अपने जीवन में हमे हर पल मारे रहता है.. संवेदनाओं से परे रक्त का एक पम्पिंग सिस्टम, दिल, जिसने पूरी जिन्दगी आपका चुतिया काटा होता है.. बस इतना सा ही.. सब एक हमाम में नंगे हो जाते हैं उस दिन.. फिर एम्बाल्मिंग होती है.. ढांचा सिल दिया जाता है.. अपने अपने तरीके से उस ढाँचे से निपट लिया जाता है.. फिर वही पांच तत्व शेष रह जाते हैं..


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बारीक़ बाल

भला हो हनी सिंह और जॉन सीना का..
जिसने आज के बच्चो को फैशन के नाम पे बाल बारीक़ छोटे रखना सीखा दिया..
हमारी तो सबसे ज्यादा कुटाई ही बालो को लेके हुई थी। हम दिलजले के अजय देवगन बनके घूमते थे,
और जिस दिन पापा के हाथ लग जाते उस दिन नाईं की दुकान से ओमकारा का लंगड़ा त्यागी बनाके ही घर लाते थे|

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शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

"तथा कथिक अच्छे दिन "

दृश्य संख्या -१

मंगरू रोड किनारे फ्रेश होने बैठा है । साथ में १० फ़ीट की दूरी पे सुमेरू भी बैठा है ।माथे पे शिकन लिए हुए  दोनों को एक ही बात की चिंता  खाये जा रही है कि अच्छे दिन आख़िर कब आएंगे ।


दृश्य संख्या -२

मिस्टर क किसी ज़रूरी काम से शहर मुख्यालय की ओर जा रहे है और अचानक लघुशंका की दस्तक पे सड़क का एक किनारा पकड़ लेते हैं हलके होने के लिए । उन्हें भी यही सवाल गुदगुदी कर रहा है कि अच्छे दिन आख़िर कब आएंगे ।


दृश्य संख्या -३


राम दुलारे के प्रश्न के प्रत्युत्तर में बिलोचन ने आधे घंटे से बने  पान मसाला के लबाब को पिच्च से बगल में थूका और कटाक्ष किया "अबे काहे के अच्छे दिन"


दृश्य संख्या -४


रिश्वत  के तौर पर लिए गए १० -१० की १५ नोट गिनते हुए मिस्टर  ख ने  " १५ लाख अकॉउंट में नहीं आने वाले  "  कहते हुए शर्मा जी को समझाया कि यही अच्छे दिन है की डेढ़ सौ में फील आगे पहुच रही है ।



ऐसे हज़ारो दृश्य है जहाँ भारतीय लोग अच्छे दिनों वाले ज़ुमले को कोस रहे हैं ।



पर उपदेश कुशल बहुतेरे 





संघवाद (फेडलिज़्म) : संवैधानिक राजसंचालन की एक प्रवृत्ति

संघवाद


संघात्मक संविधान की विशेषताएँ

संघात्मक संविधान में निम्नलिखित विशेषताएँ अपेक्षित होती हैं :
  • प्रथम, राजनयिक शक्तियों का संघीय एवं राज्य सरकारों के मध्य संवैधानिक विभाजन, द्वितीय, संघीय संविधान की प्रभुसत्ता अर्थात् प्रथम तो न संघीय और न राज्य सरकारें संघ से पृथक् हो सकती हैं।
  • द्वितीय, संघात्मक संविधान उन दोनों से समान रूप से सर्वोपरि होता है।
  • तृतीय, चूंकि संघीय एवं राज्य सरकारों के मध्य अधिकारों का स्पष्ट विभाजन होता है, अत: संघात्मक सविधान का लिखित होना भी आवश्यक है।
  • चतुर्थ, संघात्मक संविधान संघीय एवं राज्यसरकारों के समझौते का अंतिम रूप से पुष्ट करता है। अत: ऐसे संविधान का व्यावहारिक रूप से अपरिवर्तनीय भी होना अपेक्षित है। कम से कम किसी एक पक्ष के के मत से ऐसा संविधान परिवर्तित नहीं किया जा सकता। संविधान का परिवर्तन विशिष्ट परिस्थितियों में विशिष्ट प्रक्रिया द्वारा ही किया जा सकता है।
  • पंचम, किसी भी प्रकार के विवाद जो संघीय एवं राज्य सरकारों के बीच में संवैधानिक कार्यसंचालन में कर्तव्य, अधिकार अथवा साधनों के विषय में आ गए हों तो उनके निर्णय के लिए न्यायालय को सविधान के संघात्मक प्रावधानों की मींमांसा करने का पूर्ण एवं अंतिम अधिकार दिया जाना चाहिए।
इन विशेषताओं के साथ संघात्मक संविधान का एक आदर्श प्रारूप संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान है जिसका निर्माण सन् 1787 में 12 स्वतंत्र राष्ट्रों की संविदा के अनुसार हुआ था। इसके पश्चात् कनाडा,आस्ट्रेलिया, जर्मनी एवं फ्रांस इत्यादि के संघात्मक संविधानों का निर्माण हुआ। भारत का संविधान भी, जो सन् 1950 से लागू हुआ, संघात्मक संविधानों का एक नवीन दृष्टांत है।

भारत : संघात्मक या एकात्मक

प्रधानत: भारत के संविधान में संघात्मक संविधान की सभी उपर्युक्त विशेषताएँ विद्यमान हैं। किंतु भारतीय संघात्मक संविधान में कुछ विशिष्ट प्राविधान है जिनका समावेश अन्य संविधानों के कार्यसंचालन से उत्पन्न कठिनाइयों को दृष्टिगत करके किया गया है।
उदाहरणार्थ, सबसे विशिष्ट तथ्य यह है कि भारतीय संविधान संघात्मक होते हुए भी इसका निर्माण स्वतंत्र राष्ट्रों की किसी संविदा द्वारा नहीं हुआ है; बल्कि यह उन राज इकाइयों के मेल (यूनियन) से बना है जो परंतंत्र एकात्मक भारत के अंग के रूप में पहले से ही विद्यमान थे। दूसरी विशेषता यह है कि आपत्काल में भारतीय संविधान में एकात्मक संविधानों के अनुरूप केंद्र को अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए प्रावधान निहित हैं। तृतीय विशेषता यह है कि केवल एक नागरिकता (भारतीय नागरिकता) का ही समावेश किया गया है तथा एक ही संविधान केंद्र तथा राज्य दोनों ही सरकारों के कार्यसंचालन के लिए व्यवस्थाएँ प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त संविधान सभा के मतानुसार भारत एक शिशु गणतंत्र की अवस्था में है, अत: देश के तीव्र एवं सर्वतोमुखी विकास एवं उन्नति के लिए समय समय पर उपयुक्त प्रावधानों की आवश्यकता पड़ सकती है जिसके लिए संविधान संशोधन की तीन विभिन्न प्रक्रियाएँ दी गई हैं। केवल विशेष संघात्मक प्रावधानों के संशोधन के लिए ही राज्यों का मत आवश्यक है, बाकी संशोधन संसद् स्वयं कर सकती है। इस प्रकार संघात्मक संविधानों के विकास में भारतीय संविधान एक नई प्रवृत्ति, केंद्रीकरण, का सूत्रपात करता है।

स्रोत - wikipedia 

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

सानिध्य


गर्मी की भयावह दोपहर में रायबरेली से लखनऊ तक का सफ़र.. उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की एक्स्ट्रा आर्डिनरी बस.. ड्राईवर के बगल में लंबवत लंबी स्टाफ सीट.. सीट पर बैठा मैं.. पीठ पर बनियान को चीरता मेरा पसीना.. धूप में रुकी हुई बस.. लोगों के खट्टे पसीने की गंध.. दो डाकुओं का आगमन.. अच्छे वाले डाकू का मेरे बगल में आके बैठना.. मतलब कुल मिला जुला के फॉग चल रहा है..
आते ही "ओह इट्स टू वार्म"
मेरे मुंहफट मुंह से अनायास ही निकल जाता है "ग्लोबल वार्मिंग"
कन्या ने हलकी सी मुस्कराहट के साथ दर्शाया कि वह प्रगतिशील सोच की है.. (कल्पना मात्र: उसने मुंह ढका हुआ था)
प्रगतिशीलता पे असल मुहर तब लगी जब उसने मुझसे मेरा गंतव्य पुछा.. बस अपने अड्डे से निकल गयी.. आगे बाएँ मुड़कर जब उसने राजमार्ग पर अपने टायर रखे तो सूर्य की चिलचिलाती किरणों ने हम दोनों पीठ पर मानो अंगारे रख दिए.. कन्या ने अपना हैंडबैग की चेन खोली.. एक बड़ा सा काला चश्मा निकाला.. इतना बड़ा गूगल मैंने कभी नहीं देखा था.. उसके बाद कन्या ने दो घूँट पानी पिया.. फिर उसी बैग से चर्मवर्णी दस्ताने निकाले.. ये वही दस्ताने थे, जिन्हें कन्याएँ स्कूटी आदि वाहनों पर पहनती हैं.. लंबे दस्ताने एक एक करके चढ़ाये जा रहे थे.. मैं सोच रहा कि कन्याओं के लिए किसी का खून करना कितना आसान है.. चेहरा भी ढक लो, दस्ताने भी पहन लो.. सीसीटीवी और फिंगर प्रिंट की कोई समस्या नहीं.. इतने नजदीक से तिलस्मी दस्ताने वाक़ई मैंने पहली बार देखे थे, इसीलिए मैं अपलक उन्हें देखता रहा.. गनीमत थी कि कम से कम आज मैंने स्नान किया था और साफ़ कपड़ों का भी आज पहला दिन था.. कन्या के चश्मे और दस्ताने का पीठ पर आती धूप से क्या सम्बन्ध था, इस बात को समझने के लिए आइंस्टीन को फिर से जीवित होना पड़ता..रूप का नहीं पता पर अखंड विरह रंडवोँ हेतु बगल वाली सीट पर कन्या का बैठा होना ही इतनी ख़ुशी और रोमांच से भर देता है मानों कन्या बगल वाली सीट पर नहीं वरन् जीवन में ही आ गयी है.. और अगर आते ही कन्या ने आपसे ज़रा सी भी बात कर ली तो मानो मोक्ष ही मिल गया है.. अब स्वात्मा और परात्मा के मिलन को कोई नहीं रोक सकता.. मौका एक प्रतिशत ही होता है, प्रयास उसे शतांक की श्रेणी में लाते हैं.. रूप, वेशभूषा सब गौण हैं, रंडत्व सिर्फ प्रेम का भूखा होता है प्रेम के स्त्रोत का नहीं.. अतः दर्शन की चेष्टा हृदय में ही सुषुप्त है.. 
कन्या अभी भी अस्त-व्यस्त है.. मोबाइल अभी बैग में ही है और कन्या केवल उसकी कानखोंसनी निकाल के कानों में लगा लेती है.. चिलमन के अंदर ही अंदर इयरफोन कान में प्लग करके लेट्स द म्यूजिक प्ले हो जाता है.. मेरे समान्तर बैठी कन्या की जिंदगी चायना मोबाइल जैसी है और मैं नोकिया ग्यारह सौ सा चुपचाप बैठा हूँ.. मुझे पता है कि वह कन्या न केवल मेरे लिए अपितु मेरे इर्द-गिर्द बैठे प्रत्येक पुरुष मतदाता हेतु आकर्षण का विषय है.. परंतु लोगों का मुझसे द्वेष सिर्फ इस लिए है क्योंकि कन्या यदृच्छया मेरे बगल में आ के बैठ गयी, जबकि मैंने तो कोई डियो भी नहीं लगाया था.. हमारे एक बजे की लाइन में एक दम्पत्ति बैठी है.. जवानी में ही सिर के सभी बाल गँवा चुके पति कन्या के चश्मे को बेतहाशा खाऊ निगाहों से घूरे जा रहे हैं, वो उनकी पत्नी महोदया गर्दन उचका उचका के हमारे बीच की विभाजन रेखा की घटती बढ़ती दूरियों का मापन कर रही हैं.. जब जब यह दूरी शून्य होती है और कन्या और मेरे बदन के बीच अपरिहार्य घर्षण होता है, उनकी पलके खींच जाती हैं और पुतलियाँ आकार में बढ़ जाती हैं.. और उनकी नज़रों में मैं अभियुक्त हो जाता हूं.. कुछ प्रतियोगी नौजवानों की आँखों में तो मैं अपने लिए साक्षात मौत देख रहा हूँ.. ऐसा लग रहा मानों कन्या के बगल में बैठते ही मैं लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष बन गया हूँ.. या उनका लॉजिक कुछ ऐसा होगा.. जीवन भी सफ़र सा है.. दोनों में बहुत कुछ उभयनिष्ठ है.. जीवन के साथी को हम भ्रम में हमसफर कहते हैं.. जबकि ख़त्म तो जीवन को भी होना है और सफ़र को भी.. दोनों के ही अंत में तन्हाई और ठप्रेक है.. इसलिए यदि आपके किसी सहयात्री के बगल में कोई कन्या आ के बैठ जाए तो वह उतना ही दुखदाई होता है जितना मोहल्ले के किसी लौंडे को तगड़ी दुलहिन मिलने पर होता है.. कुल मिला जुला के मेरी किस्मत ज़माने को खटक रही है.. खटकने दो.. मैंने ठेका लिया है क्या.. शेष कुंठित सहयात्रियों का अवलोकन मैं नहीं करना चाहता.. कस्तूरी कुंडली बसै वाली बात हो जायेगी.. कन्या ने हरकत समाप्त कर दी है.. शायद सो गयी हो.. पर इतने सघन काले शीशे के अंदर कन्या की आँखें समझ में भी तो नहीं आतीं.. मुझसे क्या? हर मोड़ पर, ब्रेक लगते ही, एक्सीलेटर खींचते ही, मतलब हर उस बिंदु पर जहाँ जड़त्व या आघूर्ण उत्पन्न होता है, कन्या और मेरी न्यूनतम दूरी शून्य हो जाती है.. एक दो बार कन्याअ ने मेरे कंधे पे नींद मेंअपने सिर भी मारे.. रंडत्व की पवित्रतम प्रतिपूर्ति हो रही है.. ये सफ़र ही जीवन है.. तन्मय अभिलाषाओं की चाह नहीं.. बस ये ब्रेक लगता रहे, एक्सीलेटर चँप्ता रहे, मोड़ आते रहें.. मैं भी हलकी नींद में हूँ.. 
पर कन्या जाग गयी है.. बैग में कुछ हलचल हुई है.. अबकी बार पानी की बोतल है.. दर्शन की सुषुप्त अभिलाषा जागृत हो उठी है.. पर कन्या ने इस बार भी बोतल और मुंह का संपर्क चिलमन के अंदर ही अंदर बना लिया, प्यास तृप्त हुई.. पर मेरी नहीं..(छिछोरे पाठक अतिक्रमण से बचें) 
बोतल अंदर.. फोन बाहर.. कन्या ने दास्ताने पहने पहने ही कैसे टच स्क्रीन चलाया.. "क्या ऐसा कोई स्क्रीन भी आता है क्या जो दस्ताने वाली उँगलियों से भी चलता है?" दर्शन की चाह पर ये सवाल भारी पड़ा.. और मैंने अतिउत्साह में कन्या से पूछ ही लिया.. "एक्सक्यूज़ में! हाउ कम यू आर ऑपरेटिंग द स्क्रीन विथ ग्लव्स?" ये अनलाइक लंठ था.. अनबिकमिंग लंठ था.. पर अंग्रेजी के दो कारण थे.. पहला- कन्या के आगमन का सीन और उसके हाथ में मँहगा वाला फोन देख के हिंदी बोलना असहज सा लगा.. दूसरा- मैं नहीं चाहता था कि मेरे सवाल को कोई तीसरा समझे.. बेशक वहां अंग्रेजी समझने वाले और भी लोग होंगे.. प्रतियोगी भाई लोगों को सीसैट भर की अंग्रेजी तो आती ही होगी.. पर जितनी खूबसूरती से अशोक लेलैंड की आवाज में अंग्रेजी घुल मिल जाती है, शायद ही हिंदी में वो क्वालिटी हो..
मेरी सारी प्रमेय को कन्या ने चोखा साबित करते हुए अपना मुख मेरे कान के पास लाके कहा "आँय??" और मुझे भक मार गया.. सँभलते हुए मैंने उससे पूछा, "ये फोन कपड़वा से भी चलता है क्या".. तभी कन्या ने अपनी दस्तानेयुक्त तर्जनी ऊँगली मुझे दिखाई.. मेरे रंडत्व ने जो देखा वो था- गोरा बदन, स्पार्कल वाली सुनहरी नेलपॉलिश,बढ़े हुए नाख़ून जिन्हें बड़ी नज़ाकत से बेरंग छोड़ा गया था.. और मैंने जो देखा वो था- बड़ी ख़ूबसूरती से कन्या ने अपनी तर्जनी ऊँगली के शीर्ष पर एक सेमी के व्यास में दस्ताने को फाड़ा हुआ था.. ये एकमात्र ऐसी जगह थी जहाँ से कन्या सीधे हवा के संपर्क में थी.. हम दोनों हँस पड़े.. हमारे चेहरों पर लंबी सी मुस्कान खींच आई.. और आस पड़ोस में ऐसा मातम छा गया मानो कन्या में मुझे आईलाभ्यू बोल दिया हो..

कोठिली

ये सरसों और अलसी के साइज़ की कोठिली है.. पर बसावन की पतोहू इसमें चावल रखेगी.. जैसे-जैसे घरों में बंटवारे होते चले जाते हैं, कोठिली की साइज़ छोटी होती चली जाती है.. अपने जमाने में सिवान से मिट्टी ढो के घर लाना गर्मी की छुट्टियों का बेहतरीन टाइम पास होता था.. माँए खुले से आँगन में, खलिहान में मिट्टी में थोड़ा सा भूसा मिलाके ख़ूबसूरत कोठलियाँ गढ़ दिया करती थीं.. आषाढ़ की पहली बूँद से पहले उस पर तीन बार गाय के गोबर से लिपाई हो हाती थी.. अनाज सालों साल सुरक्षित रहता था.. 


समय की चाल में मोबिल के ड्रम, स्टील के कंटेनर, नयासा, सेलो और तमाम ब्रांडों के प्लास्टिक जारों ने भारतीय रसोई और इसके रसद विभाग पर आधिपत्य कर लिया.. पर आज भी कोठिली को जिन्दा रखने के लिए बसावन चाचा की गुनी पतोहू को पन्ने की तरफ से ढेर सारा प्रणाम..