शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

संघवाद (फेडलिज़्म) : संवैधानिक राजसंचालन की एक प्रवृत्ति

संघवाद


संघात्मक संविधान की विशेषताएँ

संघात्मक संविधान में निम्नलिखित विशेषताएँ अपेक्षित होती हैं :
  • प्रथम, राजनयिक शक्तियों का संघीय एवं राज्य सरकारों के मध्य संवैधानिक विभाजन, द्वितीय, संघीय संविधान की प्रभुसत्ता अर्थात् प्रथम तो न संघीय और न राज्य सरकारें संघ से पृथक् हो सकती हैं।
  • द्वितीय, संघात्मक संविधान उन दोनों से समान रूप से सर्वोपरि होता है।
  • तृतीय, चूंकि संघीय एवं राज्य सरकारों के मध्य अधिकारों का स्पष्ट विभाजन होता है, अत: संघात्मक सविधान का लिखित होना भी आवश्यक है।
  • चतुर्थ, संघात्मक संविधान संघीय एवं राज्यसरकारों के समझौते का अंतिम रूप से पुष्ट करता है। अत: ऐसे संविधान का व्यावहारिक रूप से अपरिवर्तनीय भी होना अपेक्षित है। कम से कम किसी एक पक्ष के के मत से ऐसा संविधान परिवर्तित नहीं किया जा सकता। संविधान का परिवर्तन विशिष्ट परिस्थितियों में विशिष्ट प्रक्रिया द्वारा ही किया जा सकता है।
  • पंचम, किसी भी प्रकार के विवाद जो संघीय एवं राज्य सरकारों के बीच में संवैधानिक कार्यसंचालन में कर्तव्य, अधिकार अथवा साधनों के विषय में आ गए हों तो उनके निर्णय के लिए न्यायालय को सविधान के संघात्मक प्रावधानों की मींमांसा करने का पूर्ण एवं अंतिम अधिकार दिया जाना चाहिए।
इन विशेषताओं के साथ संघात्मक संविधान का एक आदर्श प्रारूप संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान है जिसका निर्माण सन् 1787 में 12 स्वतंत्र राष्ट्रों की संविदा के अनुसार हुआ था। इसके पश्चात् कनाडा,आस्ट्रेलिया, जर्मनी एवं फ्रांस इत्यादि के संघात्मक संविधानों का निर्माण हुआ। भारत का संविधान भी, जो सन् 1950 से लागू हुआ, संघात्मक संविधानों का एक नवीन दृष्टांत है।

भारत : संघात्मक या एकात्मक

प्रधानत: भारत के संविधान में संघात्मक संविधान की सभी उपर्युक्त विशेषताएँ विद्यमान हैं। किंतु भारतीय संघात्मक संविधान में कुछ विशिष्ट प्राविधान है जिनका समावेश अन्य संविधानों के कार्यसंचालन से उत्पन्न कठिनाइयों को दृष्टिगत करके किया गया है।
उदाहरणार्थ, सबसे विशिष्ट तथ्य यह है कि भारतीय संविधान संघात्मक होते हुए भी इसका निर्माण स्वतंत्र राष्ट्रों की किसी संविदा द्वारा नहीं हुआ है; बल्कि यह उन राज इकाइयों के मेल (यूनियन) से बना है जो परंतंत्र एकात्मक भारत के अंग के रूप में पहले से ही विद्यमान थे। दूसरी विशेषता यह है कि आपत्काल में भारतीय संविधान में एकात्मक संविधानों के अनुरूप केंद्र को अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए प्रावधान निहित हैं। तृतीय विशेषता यह है कि केवल एक नागरिकता (भारतीय नागरिकता) का ही समावेश किया गया है तथा एक ही संविधान केंद्र तथा राज्य दोनों ही सरकारों के कार्यसंचालन के लिए व्यवस्थाएँ प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त संविधान सभा के मतानुसार भारत एक शिशु गणतंत्र की अवस्था में है, अत: देश के तीव्र एवं सर्वतोमुखी विकास एवं उन्नति के लिए समय समय पर उपयुक्त प्रावधानों की आवश्यकता पड़ सकती है जिसके लिए संविधान संशोधन की तीन विभिन्न प्रक्रियाएँ दी गई हैं। केवल विशेष संघात्मक प्रावधानों के संशोधन के लिए ही राज्यों का मत आवश्यक है, बाकी संशोधन संसद् स्वयं कर सकती है। इस प्रकार संघात्मक संविधानों के विकास में भारतीय संविधान एक नई प्रवृत्ति, केंद्रीकरण, का सूत्रपात करता है।

स्रोत - wikipedia 

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