सन १९९८
बड़े बुजुर्गों के मरने के बाद गाँव में एक नया दौर शुरू हुआ है.. बुजुर्ग के नाम पे अब सिर्फ बसावन चाचा टाइप के अप्रभावी लोग ही जिन्दा बचे हैं.. दो साल पहले किसी की मजाल कि कोई गाँव में मायेक पे गाना बजा दे पर अब लालजी रोज अपने छत पे गाना बजाते हैं.. पांच फीट की लम्बाई, बीच की मांग काढ़े सरसों के तेल में नहाये घने काले बाल, मूंछहीन साफ़ सुथरा चेहरा, हाफ बाजू की चेकदार टीशर्त और माता के दरबार की लाल छींट वाला गमछा लपेटे कांख में रेडियो दबाये फोन इन फर्माहिश सुन रहे जिस इंसान से आपका परिचय करवाया जा रहा है वो लालजी हैं..
इन्होने गाँव कभी नहीं छोड़ा पर आज भी अच्छे अच्छे बाहर रहने वाले लौंडों को अपने समसामयिक फ़िल्मी ज्ञान से पछाड़ देंगे.. ये कई मामलों में मेरे गाँव के क्रांतिवीर हैं.. कस्बा से डेग खरीद के लायें हैं, टेप भरवाने और बैटरी भरवाने हर हफ्ते ही क़स्बा जाते हैं.. पर पिछले कई दिनों से एक ही टेप हर शाम बजता है.. एक साइड दिलवाले और दुसरे साइड आशिकी का गाना है.. हर गाने में पहले डायलॉगबाजी होती है.. कोई मामा ठाकुर है.. कोई सपना है.. कोई अरुण है.. मुझे नहीं पता कि ये लोग कौन हैं.. पर इतना जरूर पता है कि बिरहा गाने का इस्टाइल अब बदल गया है.. "दहेज़ काण्ड" और "मोहनिया की बेटी" के साथ साथ अब अंग्रेजी गाना का दौर शुरू हो गया है.. दुआर पे कजरी गाने वाले या तो मर गये हैं या तो मरने वाले हैं.. ये दौर हर हाल में लालजी का है..
जब तक लालजी रंग, दिल का क्या कसूर और दिलवाले का कैसेट नहीं बजाते हैं तब तक मुसाफिर की पतोहू की दाल नही चूरती.. जब तक "कितना हसीन चेहरा, कितनी प्यारी बातें" वाली लाइन नहीं बजती सुदर्सन-बो की कंहतरी में जोरन नहीं जमता.. बियाह निबटा चुकी परन्तु बेगौना हुई नयी ब्याह्ताएं सांझ को गाना लिख लेती हैं, अगले दिन दुपहरिया में वही गाना गाते गाते अपने ससुरारी के लिए बेना बीनती हैं, परदा बुनती हैं.. "सातों जनम मैं तुझे" वाला गाना पूरा याद होने के बाद अतवरिया को पूरा विश्वास है कि वो गवना होते ही अपने पति की कोहबर वाली शिकायत दूर कर लेगी... मोहल्ले का एकमात्र कॉलेज स्टूडेंट हमारे बसावन चचा के कुलदीपक भी अपनी साइकिल के दोनों मोट्गार्ड पे दिलवाले का चित्रहार सटाए हैं.. मुसाफिर के घुरहू दुसरे आदमी हैं जिन्होंने लालजी से प्रेरणा लेकर मूंछों से स्वतंत्रता पायी है.. गवना के चार महिना बाद भी घुरहू चाहे भले ही पोखरी किनारे बैठ के मछरी ही मार रहे हों, वही लाल बुस्कर्ट और बेल्बत्तम पैंट पहने नज़र आयेंगे.. यहाँ हर लड़का अरुण है हर लड़की सपना.. पुरवैया चलने की कामना करते हुए एडमिन भी सांझ को कंधे पे लेवा डालकर बाँस की सीढ़ियों से छत पर जाता था.. लेवे को बिछाकर मधुर गीतों में खोया सितारे देखता कब सो जाता था कुछ नहीं पता...
बड़े बुजुर्गों के मरने के बाद गाँव में एक नया दौर शुरू हुआ है.. बुजुर्ग के नाम पे अब सिर्फ बसावन चाचा टाइप के अप्रभावी लोग ही जिन्दा बचे हैं.. दो साल पहले किसी की मजाल कि कोई गाँव में मायेक पे गाना बजा दे पर अब लालजी रोज अपने छत पे गाना बजाते हैं.. पांच फीट की लम्बाई, बीच की मांग काढ़े सरसों के तेल में नहाये घने काले बाल, मूंछहीन साफ़ सुथरा चेहरा, हाफ बाजू की चेकदार टीशर्त और माता के दरबार की लाल छींट वाला गमछा लपेटे कांख में रेडियो दबाये फोन इन फर्माहिश सुन रहे जिस इंसान से आपका परिचय करवाया जा रहा है वो लालजी हैं..
इन्होने गाँव कभी नहीं छोड़ा पर आज भी अच्छे अच्छे बाहर रहने वाले लौंडों को अपने समसामयिक फ़िल्मी ज्ञान से पछाड़ देंगे.. ये कई मामलों में मेरे गाँव के क्रांतिवीर हैं.. कस्बा से डेग खरीद के लायें हैं, टेप भरवाने और बैटरी भरवाने हर हफ्ते ही क़स्बा जाते हैं.. पर पिछले कई दिनों से एक ही टेप हर शाम बजता है.. एक साइड दिलवाले और दुसरे साइड आशिकी का गाना है.. हर गाने में पहले डायलॉगबाजी होती है.. कोई मामा ठाकुर है.. कोई सपना है.. कोई अरुण है.. मुझे नहीं पता कि ये लोग कौन हैं.. पर इतना जरूर पता है कि बिरहा गाने का इस्टाइल अब बदल गया है.. "दहेज़ काण्ड" और "मोहनिया की बेटी" के साथ साथ अब अंग्रेजी गाना का दौर शुरू हो गया है.. दुआर पे कजरी गाने वाले या तो मर गये हैं या तो मरने वाले हैं.. ये दौर हर हाल में लालजी का है..
जब तक लालजी रंग, दिल का क्या कसूर और दिलवाले का कैसेट नहीं बजाते हैं तब तक मुसाफिर की पतोहू की दाल नही चूरती.. जब तक "कितना हसीन चेहरा, कितनी प्यारी बातें" वाली लाइन नहीं बजती सुदर्सन-बो की कंहतरी में जोरन नहीं जमता.. बियाह निबटा चुकी परन्तु बेगौना हुई नयी ब्याह्ताएं सांझ को गाना लिख लेती हैं, अगले दिन दुपहरिया में वही गाना गाते गाते अपने ससुरारी के लिए बेना बीनती हैं, परदा बुनती हैं.. "सातों जनम मैं तुझे" वाला गाना पूरा याद होने के बाद अतवरिया को पूरा विश्वास है कि वो गवना होते ही अपने पति की कोहबर वाली शिकायत दूर कर लेगी... मोहल्ले का एकमात्र कॉलेज स्टूडेंट हमारे बसावन चचा के कुलदीपक भी अपनी साइकिल के दोनों मोट्गार्ड पे दिलवाले का चित्रहार सटाए हैं.. मुसाफिर के घुरहू दुसरे आदमी हैं जिन्होंने लालजी से प्रेरणा लेकर मूंछों से स्वतंत्रता पायी है.. गवना के चार महिना बाद भी घुरहू चाहे भले ही पोखरी किनारे बैठ के मछरी ही मार रहे हों, वही लाल बुस्कर्ट और बेल्बत्तम पैंट पहने नज़र आयेंगे.. यहाँ हर लड़का अरुण है हर लड़की सपना.. पुरवैया चलने की कामना करते हुए एडमिन भी सांझ को कंधे पे लेवा डालकर बाँस की सीढ़ियों से छत पर जाता था.. लेवे को बिछाकर मधुर गीतों में खोया सितारे देखता कब सो जाता था कुछ नहीं पता...
सारांश
लालजी के एक अढ़ाई सौ का डेग मने साउंडबॉक्स ने पूरे मोहल्ले की फिजा बदल दी थी.. और हम एक आईफोन लेने के बाद सोचते हैं कोहड़े में तीर मार लिए
लालजी के एक अढ़ाई सौ का डेग मने साउंडबॉक्स ने पूरे मोहल्ले की फिजा बदल दी थी.. और हम एक आईफोन लेने के बाद सोचते हैं कोहड़े में तीर मार लिए
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