इस लोकोक्ति के द्वितीय पक्ष को ज्यादा प्रधानता दी जाने लगी है.. मृत भावनाओं की अंधी दौड़ में भागते लोग अपनी बात रखने के लिए इतने उतावले हो उठते हैं कि उनका सम्मुख व्यक्ति क्या कह रहा है , वो सुन ही नहीं पाते और अपनी भावी असंगत प्रतिक्रिया को अपने ही मस्तिष्क में सजाने संवारने में सामने वाले व्यक्ति की कही जा रही बातों को प्रारम्भ से ही विस्मृत कर देते हैं.. न सुनने की ज्यादा समस्या उन्हें होती है जो व्यक्ति आत्ममुग्ध रहते हैं..
सुनने का पक्ष ज्यादा प्रबल होता है.. "करो अपने मन की" संवाद के समाप्त हो जाने के बाद की प्रक्रिया है, यह कर्मणा पक्ष का अवयव है.. पर "सुनो सबकी" संवाद की आत्मा है, यह मनसा पक्ष का अभिसार है.. मनसा और कर्मणा के मध्य वाचा पक्ष है, जो आजकल अभिव्यक्ति की ठिठोली पे तर्क से सम्बन्ध तोड़ रहा है.. सम्मुख व्यक्ति को जब सुना है तो अपनी बात समाप्त हो जाने के बाद वह भी आपकी बात को उतनी ही तन्मयता और समर्पण के साथ सुनता है.. सूचना क्रांति के दौर में सबसे दुखद यह है कि अधिकतर लोगों के मन में ये धारणा बैठ गयी है कि वही सही हैं, शेष गलत हैं.. और अपने सही को सही मनवाने की होड़ मची हुई है.. इसी होड़ को ख़ामोशी का मुक्का मारना है.. सुनना है.. क्या पता सामने वाले की मनसा वही हो जो आपकी हो, और कर्मणा उभयनिष्ठ हो जाए..
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