जब डेढ़ रूपए महिना की फीस में भिन्न से लेकर दशमलव तक के कांसेप्ट क्लियर हो जाएँ और दस साल बाद आप उसी ज्ञान को अंग्रेजी में उड़ेल के अपनी पढ़ाई का खर्चा निकालें और पंद्रह साल बाद ऐसी जगह पे पहुँच जाएँ जहाँ आप स्कूलों में वृक्षारोपण हेतु बतौर मेहमान जाएँ, तो पीछे लौट के देखिएगा.. एक चेहरा नज़र आएगा जो आज भी आपके अंदर जीवित है, तुम्हारा गुरु आज भी प्रासंगिक है.

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