बासी मुंह चाह... दंतवा गला देगी बबुआ..कौन फेरा में हो...
कोने से अम्मा ने सफाई दी-तेजपात डाले हैं...
बाबूजी फिर बोले-तो वो कौन सी नीम है वो कितनी बार कहे हैं इनको चीनी वाली चाय की आदत मत डालो..
दुकान की कठोर पावरोटी चाय में डूब चुकी थी...सरंध्र छिद्र चायमय हो चुके थे, काठ सी पावरोटी भींग के सोंधी महक के साथ आमंत्रित कर रही थी..ऐसे में दांत मांजना पावरोटी के सौम्य व्यवहार के साथ अन्याय था
बाबूजी की नजर पावरोटी पे पड़ी... इ बीमारी का घर कहाँ से कीने हो? लात से मैदा सान के तीन दिन सड़ाते हैं फिर बनाते हैं..
पूरा माहौल किचाईन हो उठा.. कटोरी में चाय के स्तर से इंच भर ऊपर पावरोटी का आधा गीला हिस्सा नजरों के सामने था जो अब लटक के वापस कटोरी में गिरने ही वाला था... इसका स्वाद मुंह में जाने से पहले ही मिलना शुरू हो गया था... कुटाई तय थी अगर मूंह में जाता... सुबह इतना सन्नाटा....बाबूजी ने पॉज कर दिया... ग्रीन सिग्नल की उम्मीद बेकार थी..पावरोटी का तारणहार सुन्न था...गर्दन को मोड़के करुण ह्रदय से देखा... सबेरे का पहला आहार पस्त हो गया... बाबूजी जा चुके थे... रसोई की तरफ कदम दौड़ पड़े...चम्मच नामक वस्तु न मिली...छोटी कलछुल ने चाय में डूबी आधी पावरोटी का रेस्क्यू ऑपरेशन किया और गंतव्य तक पहुँचाया ... स्वाद था पर करारापन नहीं... आगे की कसक हाथ में रह गये आधे हिस्से ने पूरी की....
कोने से अम्मा ने सफाई दी-तेजपात डाले हैं...
बाबूजी फिर बोले-तो वो कौन सी नीम है वो कितनी बार कहे हैं इनको चीनी वाली चाय की आदत मत डालो..
दुकान की कठोर पावरोटी चाय में डूब चुकी थी...सरंध्र छिद्र चायमय हो चुके थे, काठ सी पावरोटी भींग के सोंधी महक के साथ आमंत्रित कर रही थी..ऐसे में दांत मांजना पावरोटी के सौम्य व्यवहार के साथ अन्याय था
बाबूजी की नजर पावरोटी पे पड़ी... इ बीमारी का घर कहाँ से कीने हो? लात से मैदा सान के तीन दिन सड़ाते हैं फिर बनाते हैं..
पूरा माहौल किचाईन हो उठा.. कटोरी में चाय के स्तर से इंच भर ऊपर पावरोटी का आधा गीला हिस्सा नजरों के सामने था जो अब लटक के वापस कटोरी में गिरने ही वाला था... इसका स्वाद मुंह में जाने से पहले ही मिलना शुरू हो गया था... कुटाई तय थी अगर मूंह में जाता... सुबह इतना सन्नाटा....बाबूजी ने पॉज कर दिया... ग्रीन सिग्नल की उम्मीद बेकार थी..पावरोटी का तारणहार सुन्न था...गर्दन को मोड़के करुण ह्रदय से देखा... सबेरे का पहला आहार पस्त हो गया... बाबूजी जा चुके थे... रसोई की तरफ कदम दौड़ पड़े...चम्मच नामक वस्तु न मिली...छोटी कलछुल ने चाय में डूबी आधी पावरोटी का रेस्क्यू ऑपरेशन किया और गंतव्य तक पहुँचाया ... स्वाद था पर करारापन नहीं... आगे की कसक हाथ में रह गये आधे हिस्से ने पूरी की....
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