दृश्य संख्या -१
मंगरू रोड किनारे फ्रेश होने बैठा है । साथ में १० फ़ीट की दूरी पे सुमेरू भी बैठा है ।माथे पे शिकन लिए हुए दोनों को एक ही बात की चिंता खाये जा रही है कि अच्छे दिन आख़िर कब आएंगे ।
दृश्य संख्या -२
मिस्टर क किसी ज़रूरी काम से शहर मुख्यालय की ओर जा रहे है और अचानक लघुशंका की दस्तक पे सड़क का एक किनारा पकड़ लेते हैं हलके होने के लिए । उन्हें भी यही सवाल गुदगुदी कर रहा है कि अच्छे दिन आख़िर कब आएंगे ।
दृश्य संख्या -३
राम दुलारे के प्रश्न के प्रत्युत्तर में बिलोचन ने आधे घंटे से बने पान मसाला के लबाब को पिच्च से बगल में थूका और कटाक्ष किया "अबे काहे के अच्छे दिन"
मंगरू रोड किनारे फ्रेश होने बैठा है । साथ में १० फ़ीट की दूरी पे सुमेरू भी बैठा है ।माथे पे शिकन लिए हुए दोनों को एक ही बात की चिंता खाये जा रही है कि अच्छे दिन आख़िर कब आएंगे ।
दृश्य संख्या -२
मिस्टर क किसी ज़रूरी काम से शहर मुख्यालय की ओर जा रहे है और अचानक लघुशंका की दस्तक पे सड़क का एक किनारा पकड़ लेते हैं हलके होने के लिए । उन्हें भी यही सवाल गुदगुदी कर रहा है कि अच्छे दिन आख़िर कब आएंगे ।
दृश्य संख्या -३
राम दुलारे के प्रश्न के प्रत्युत्तर में बिलोचन ने आधे घंटे से बने पान मसाला के लबाब को पिच्च से बगल में थूका और कटाक्ष किया "अबे काहे के अच्छे दिन"
दृश्य संख्या -४
रिश्वत के तौर पर लिए गए १० -१० की १५ नोट गिनते हुए मिस्टर ख ने " १५ लाख अकॉउंट में नहीं आने वाले " कहते हुए शर्मा जी को समझाया कि यही अच्छे दिन है की डेढ़ सौ में फील आगे पहुच रही है ।
ऐसे हज़ारो दृश्य है जहाँ भारतीय लोग अच्छे दिनों वाले ज़ुमले को कोस रहे हैं ।
पर उपदेश कुशल बहुतेरे
रिश्वत के तौर पर लिए गए १० -१० की १५ नोट गिनते हुए मिस्टर ख ने " १५ लाख अकॉउंट में नहीं आने वाले " कहते हुए शर्मा जी को समझाया कि यही अच्छे दिन है की डेढ़ सौ में फील आगे पहुच रही है ।
ऐसे हज़ारो दृश्य है जहाँ भारतीय लोग अच्छे दिनों वाले ज़ुमले को कोस रहे हैं ।
पर उपदेश कुशल बहुतेरे
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