शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

गांव की रामलीला

एक दौर था कि शाम 7 बजे के बाद जैसे ही रामलीला मैदान (जो कि हमारा प्राथमिक स्कूल भी था ) से निकली हारमोनियम की आवाज़ कान में पड़ती थी , अध्ययन के लिए जलाये गए लालटेन को बुझा देने को मन कुलबुलाने लगता था । हर रोम से यही कामना होती थी कि अब छोटे पापा (चाचा जी ) स्वीकृति दे दें कि लालटेन बंद कर के घर जाओ । घर जाके जल्दी जल्दी १-२ रोटियों को निगलने के बाद हम बोरी और ओस से बचने के लिए शाल लेकर स्कूल की ओर उड़ पड़ते थे । दर्शक दीर्घा की पहली कतार में जगह बिछने (चुनने ) की होड़ सी थी  हमउम्र साथियों में ।
राम लीला में पाठ (पात्र और अदाकारी) को लेकर मन के अंदर अजीब सी भावना हुआ करती थी। खिड़कियों से झाँक झाँक कर मेकअप करते कलाकारों को देख कर हूक सी उठा करती थी । चरित्र निभाने वाले कलाकारों में कुछेक सदस्य परिवार के होते थे फिर भी हमें मेकअप कक्ष में दाख़िल होने की कोई वरीयता नहीं मिलती थी । इन सारी उत्सुकताओं की वजहों में एक वजह ये भी थी कि समापन के दिन हर कलाकार को मेकअप कक्ष में मिठाई मिलती थी और मंच पे पुरस्कार स्वरुप बनियान । हालाँकि आगामी वर्षों में ये दर्द जाता रहा और मुझे भी भूमिकाओं को निभाने के प्रस्ताव मिलने लगे । चूँकि मुझे राग , लय , सुर की समझ कम थी तो पद्य वाले पाठ नहीं मिलते थे जिनमे बहरत हुआ करती थी । गद्य पाठ में माहिर होने के कारण हमें शत्रुघ्न, वाल्मीकि, समुद्र , सुषेन वैद्य या ऐसे ही किसी चरित्र को निभाने की जिम्मेवारी मिलने लगी । आखिरी ४ दिनों की लीला में "रावण" का किरदार न मिलने का मलाल आज भी है मन में 
मुझे किसी मंच पे बोलने की प्राथमिक शिक्षा अपने गांव की रामलीला के मंच से ही मिली है और मैं इस बात के लिए सदा आभारी रहूँगा ।
मैं अपने क्षेत्र , गाँव के हर युवा साथी से ये अपील करना चाहूँगा कि अपने व्यवहार, सहयोग, निष्ठा ओर आध्यात्म की भावना से आगामी वर्षों की राम लीला की सार्थकता बनाये रखें ।

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