उदारीकरण की नीतियाँ हमेशा सुखद नहीं होतीं। कठोर फैसले लेने नितांत आवश्यक हैं और उनकी आवश्यकता तब और बढ़ जाती है जब मुद्दा राष्ट्र की सम्प्रभुता और अखंडता को सजोने का हो। कम्युनिस्ट इस राष्ट्र की नीतियों से खुश नहीं हैं, आतंकवाद इस देश की धर्मनिरपेक्षता से, कुछ लोग इसकी सीमा रेखा से खुश नहीं हैं और कुछ को तो संविधान में ही विश्वास नही है । तो क्या राष्ट्र तुष्टिकरण की नीति पे चले और सबकी नाराज़गी और घृणा को स्थान देके के फ़ैसला ले। राष्ट्र विरोधी घटनाओं की भर्त्सना ही एक मात्र विकल्प क्यों दिखता है हमें या हमारे राष्ट्र के नुमाइंदों को और उसमे से भी कुछ तो खुल के विरोध भी नहीं कर पाते। निंदा करते रहिये और थोपते रहिये आक्षेप दूसरे पर परन्तु ये असहनीय है की आप की स्वतंत्रता और स्वछ्न्दता की क़ीमत हर बार कुछ लोग ही चुकाएँ और वो भी अपने प्राण देकर । रात को बियर के चुस्की , मल्टीप्लेक्स थिएटरों में पॉपकॉर्न के साथ फिल्मों का आनंद, रेस्त्रा में पिज़्ज़ा और बर्गर के स्वादिष्ट टुकड़ों, टीवी के स्वयंवरों और निज़ी सम्बन्धों की ऐच्छिक सार्वजनिक छीछा -लेदर का सुलभ दर्शन आपको सौगात में नहीं मिलें है। दूर कहीं उसकी एक बड़ी कीमत चुका रहे हैं हमारे अपने ही लोग
जन मानस के एक वर्ग को तो फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनके नज़रिये काल्पनिकता से ओत - प्रोत है जिसमे विडियो गेम का एक हीरो सारी समस्याओं को हल कर देता हैं और उस मानसिकता में रिसेट का विकल्प हमेशा रहा है
फर्क हमें पड़ता है क्योंकि हमें इतिहास पढ़ाया गया है प्राथमिक विद्यालयों में जिसमें अनगिनत हीरो थे, सदियों का संघर्ष था और रिसेट का कोई विकल्प नहीं।
हमें विकसित राष्ट्र के लिए एक निरंतर विकासशील नज़रिया चाहिए जिसमे सही को सही और ग़लत को ग़लत कहके उसे दण्डित करने की शक्ति हो।
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