मखावन लाल जी, बहुत होनहार किस्म के छात्र थे.. उस जमाने में हम सब उनको बड़े अदब से सुनते थे.. उनके नाम के कई पर्यायवाची थे.. इनसाइक्लोपीडिया, सर्च इंजन, हर्बेरियम इत्यादि.. बीए में जबसे युनिवेर्सिटी टाप किया था लोगों के बीच तगड़ी साख बन गयी थी.. पूर्वांचल से अवध, रूहेलखंड से बुंदेलखंड प्रत्येक टोली ने उन्हें जी भर के सम्मान दिया.. छात्रावास के आधे छात्रों के लिए वो चलती फिरती सामान्य ज्ञान की किताब थे.. कई लोगों के लिए उनका पैंतालीस मिनट का सानिध्य दिल्ली की सिविल सेवा की कोचिंग के समान था.. समसामयिकी की बात करें तो बगल के चौराहे से लेकर संसद तक, यूनिवर्सिटी की क्रिकेट टीम से लेकर बीसीसीआई की अंतरिम बैठकों तक, मिर्जापुर के कट्टों की फक्ट्रियों से लेकर डीआरडीओ- इसरो तक की नियमित पड़ताल करते थे.. ज्ञान में कल्पना और सृजनशीलता का छौंका तो था पर घमंड कत्तई नहीं.. ऊपर से जुगाड़ भर की अंग्रेजी उनके व्यक्तित्व को समग्रता प्रदान करती थी.. भूगोल और मानव विज्ञान में उन्हें विशेष योग्यता थी.. जीवन का बस एक ही लक्ष्य था अध्यापन, जिसकी पूर्वगामी प्रैक्टिस वो दुसरे अन्तेह्वासियों के कमरों में जा कर किया करते थे.. उनकी इस अध्यापन कला को दुनिया डीलिंग के नाम से जानती थी और उन्हें लोग प्रेम और सम्मान से डीलू कह कर पुकारते थे.. अपने कक्ष में उन्होंने कभी भी कोई ज्ञानोपदेश नहीं दिया..
सर्व गुण सम्पन्नता बड़ी खतरनाक चीज होती है.. टैलेंटेड लोगों से कन्याएं प्रायः बिदकती हैं.. पर उनके जीवन में करने के लिए इतना कुछ था कि किसी कन्या को समय निकाल के देना उनके लिए अपनी किडनी समर्पित करने के समान था..
पर उस जमाने में यूनिवर्सिटी में कमाल का माहौल होता था.. ग्रेजुएशन में कैंपस में कन्या- युवक के बीच ऐसा प्रतिकर्षण होता था मानो चुम्बक के समान ध्रुव हों.. गाँव से आये लौंडे तीन साल अपना व्यक्तित्व निखारते थे..जाकी की चड्ढी और अडिदास के जूतों से सफ़र की शुरुआत होते होते ब्रीलक्रिम और गार्नियर मेंस फेसवाश तक पहुँच जाती थी.. नाड़े वाला चड्ढा तवा पोंछने के काम आता था.. लौंडों के अंदरूनी आकर्षण का आलम ये था कि कन्या से भले ही पिछले अढ़ाई वर्ष में कोई बात नहीं हुई हो परन्तु बाकि मित्र उसे अपनी भाभी ही मानते थे और उसकी रक्षा को तत्पर रहते थे.. यदि किसी और कंटक ने उस पुष्प का पीछा किया तो इसकी कीमत उस कांटे को टाँके लगवा के चुकानी पड़ती थी..
ग्रामीण अंचल से आईं राजकुमारियाँ अपना रंग निखारती थीं.. फेयर एंड लवली और पोंड्स से ऊपर उठकर कुछ नया ओले टाइप का ट्राई करती थी.. शुरू शुरू में तो घरवालों का विश्वास और आत्मविश्वास की लड़ाई में घरवालों का भरोसा हावी रहता था.. महिला छात्रावास में तो मस्तिस्क की चोटियाँ खुलने में एक वर्ष लगता था.. परन्तु कालांतर में उन्होंने भी नाख़ून बढ़ा लिए.. रंग बिरंगी नह्पलिशों को लगाकर खुद को तितली और एंजेल अवतार लिया.. उधर गाँव से आया मनोहर भी मनु बन चूका है.. पूर्व के ऑक्सफ़ोर्ड में डीन ऑफिस के सामने खड़ा आईडी के कैनवास जूतों और मुफ़्ती की आधी बांह की बुस्कर्ट पहने बीए थर्ड इयर में वो भी इंजीनियरिंग टाइप की यूरोपीय फीलिंग लेता है..
कहानी पे वापस आते हैं.. इस भौतिक प्रगति से दूर इस कहानी का हीरो अपने में मस्त है.. ओवरआल डिस्टिंक्शन में बीए पास करके एम्ए में एडमिशन ले चूका है.. पर एमए में बड़ा खुला खुला माहौल है.. ग्रेजुएशन में तो ऐसा लगता था मानों अगर किसी बालक ने किसी कन्या से बात कर ली तो दोनों को संक्रामक बीमारी हो जायेगी पर अब ऐसा नहीं है.. नए माहौल में नये मित्र मिलते हैं.. अब मित्र का दायरा विस्तृत है.. कुंठित और संकुचित परिभाषाएं खंडित हो चुकी हैं.. अभी राधिका टिफिन लाती है तो उसमे सुरेश और गोपाल दोनों खाते हैं.. लैंगिक वैमनस्य समाप्त हो चूका है.. झगड़ा होता है तो रत्ना देवी रामसजीवन को पीठ पे मुक्के भी मार देती है.. ग्रेजुएशन टाइम में तो रामसजीवन रत्नादेवी की आवाज को भी तरसते थे.. रजाई में कितनी ही बार उसके नाम से कैवल्य प्राप्त कर चुके थे.. पर अब पोस्ट ग्रेजुएशन है.. यहाँ तुच्छता और लैंगिक अश्यपृश्यता का कोई स्थान नहीं.. कैंपस में तो पूरा जेएनयू टाइप माहौल है.. भले ही ऑफ कैंपस समस्त रंडत्व रिस्टोर हो जाए... पर हमारे हीरो मखावन लाल को न पहले कन्या में इंटरेस्ट था और न ही वो आधी आबादी के साथ क्लास में सीट साझा करने के इच्छुक हैं.. हँसते मुस्कुराते आते हैं, पूरी तन्मयता के साथ लेक्चर सुनते हैं, डिस्कशन करते हैं और फिर वापस छात्रावास में डीलिंग करने चले जाते हैं.. मखावन लाल के इसी स्प्राइट अंदाज के सभी कायल थे.. परन्तु आसक्ति जब टूटती है तो विरक्ति लाती है..विरक्ति जब टूटती है तो आसक्ति लाती है..
पिछले तीन सालों में कन्या में दिलचस्पी न रखने वाले मखावन को एक नयी कन्या सुनैना ने अपने पहले ही दिन अपना दीवाना बना दिया.. हफ्ते भर के अन्दर मखावन जी की रिंग टोन से लेकर कॉलर टोन सब बदल गयी.. उनकी दीवानगी सुनैना के टैलेंट के प्रति थी.. परन्तु चैतन्य का दीवाना अपनी जड़ सजा रहा था.. फेसपैक लगने लगे.. डाबर से लेकर भीयलसीसी तक सब घंसाने लगा.. एक शौक़ीन जूनियर के कमरे में घंटों पुरुष सौन्दर्यवर्धन की संगोष्टियां होतीं.. न केवल पुरुष सौन्दर्य अपितु उस कन्या विशेष की पसंद को ख्याल रखते हुए अगले सप्ताह तक की श्रृंगार पटार योजनायें तैयार कर ली गयीं.. परिश्रम का फल तो मिला.. चेहरे की रौनक बदल गयी.. पर जिस साध्य हेतु यह सौन्दर्य साधना की गयी थी वो चाँद था.. वह चाँद पहले से ही किसी और सूरज की रौशनी से गुलजार था.. अन्तोगत्वा चकोर के श्रृंगार ने रति की बजाय बिरह को आत्मसात किया.. चक्रार्ध में आसक्ति से पुनः विरक्ति का चक्रण हुआ.. ये चक्रण ही एकमात्र सत्य है.. पर कथा यहाँ समाप्त नहीं होती.. चक्र अभी शेष था..
केन्द्रीय विद्यालय में शिक्षक की नियुक्ति होते ही मखावन लाल की शादी पिछले वर्ष हुई.. भौजाई के रूप में सौन्दर्यमय प्रेम का न केवल पुनर्जन्म हुआ बल्कि रति की पराकाष्ठा भी प्राप्त हुई.. जयमाल वाली फोटो पर हमने बधाई कमेंट किया था.."कस्तूरी कुंडली बसे..." आजकल हर दिन फोटो अपलोड होती है.. शायरियाँ लिखी जाती हैं, नगमे समर्पित किये जाते हैं.. सुनैना जी का तो पता नहीं, पर कभी कभी हमारा अवैवाहिक दिल जरुर दुःख उठता है.. मखावन सर ऐसे ही रोज रोज फोटो अपलोड करते रहें, सत्यनारायण भगवान् से यही हमारी प्रार्थना है.. बोलो वृन्दावन बिहारी लाल की जय..
सर्व गुण सम्पन्नता बड़ी खतरनाक चीज होती है.. टैलेंटेड लोगों से कन्याएं प्रायः बिदकती हैं.. पर उनके जीवन में करने के लिए इतना कुछ था कि किसी कन्या को समय निकाल के देना उनके लिए अपनी किडनी समर्पित करने के समान था..
पर उस जमाने में यूनिवर्सिटी में कमाल का माहौल होता था.. ग्रेजुएशन में कैंपस में कन्या- युवक के बीच ऐसा प्रतिकर्षण होता था मानो चुम्बक के समान ध्रुव हों.. गाँव से आये लौंडे तीन साल अपना व्यक्तित्व निखारते थे..जाकी की चड्ढी और अडिदास के जूतों से सफ़र की शुरुआत होते होते ब्रीलक्रिम और गार्नियर मेंस फेसवाश तक पहुँच जाती थी.. नाड़े वाला चड्ढा तवा पोंछने के काम आता था.. लौंडों के अंदरूनी आकर्षण का आलम ये था कि कन्या से भले ही पिछले अढ़ाई वर्ष में कोई बात नहीं हुई हो परन्तु बाकि मित्र उसे अपनी भाभी ही मानते थे और उसकी रक्षा को तत्पर रहते थे.. यदि किसी और कंटक ने उस पुष्प का पीछा किया तो इसकी कीमत उस कांटे को टाँके लगवा के चुकानी पड़ती थी..
ग्रामीण अंचल से आईं राजकुमारियाँ अपना रंग निखारती थीं.. फेयर एंड लवली और पोंड्स से ऊपर उठकर कुछ नया ओले टाइप का ट्राई करती थी.. शुरू शुरू में तो घरवालों का विश्वास और आत्मविश्वास की लड़ाई में घरवालों का भरोसा हावी रहता था.. महिला छात्रावास में तो मस्तिस्क की चोटियाँ खुलने में एक वर्ष लगता था.. परन्तु कालांतर में उन्होंने भी नाख़ून बढ़ा लिए.. रंग बिरंगी नह्पलिशों को लगाकर खुद को तितली और एंजेल अवतार लिया.. उधर गाँव से आया मनोहर भी मनु बन चूका है.. पूर्व के ऑक्सफ़ोर्ड में डीन ऑफिस के सामने खड़ा आईडी के कैनवास जूतों और मुफ़्ती की आधी बांह की बुस्कर्ट पहने बीए थर्ड इयर में वो भी इंजीनियरिंग टाइप की यूरोपीय फीलिंग लेता है..
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पिछले तीन सालों में कन्या में दिलचस्पी न रखने वाले मखावन को एक नयी कन्या सुनैना ने अपने पहले ही दिन अपना दीवाना बना दिया.. हफ्ते भर के अन्दर मखावन जी की रिंग टोन से लेकर कॉलर टोन सब बदल गयी.. उनकी दीवानगी सुनैना के टैलेंट के प्रति थी.. परन्तु चैतन्य का दीवाना अपनी जड़ सजा रहा था.. फेसपैक लगने लगे.. डाबर से लेकर भीयलसीसी तक सब घंसाने लगा.. एक शौक़ीन जूनियर के कमरे में घंटों पुरुष सौन्दर्यवर्धन की संगोष्टियां होतीं.. न केवल पुरुष सौन्दर्य अपितु उस कन्या विशेष की पसंद को ख्याल रखते हुए अगले सप्ताह तक की श्रृंगार पटार योजनायें तैयार कर ली गयीं.. परिश्रम का फल तो मिला.. चेहरे की रौनक बदल गयी.. पर जिस साध्य हेतु यह सौन्दर्य साधना की गयी थी वो चाँद था.. वह चाँद पहले से ही किसी और सूरज की रौशनी से गुलजार था.. अन्तोगत्वा चकोर के श्रृंगार ने रति की बजाय बिरह को आत्मसात किया.. चक्रार्ध में आसक्ति से पुनः विरक्ति का चक्रण हुआ.. ये चक्रण ही एकमात्र सत्य है.. पर कथा यहाँ समाप्त नहीं होती.. चक्र अभी शेष था..
केन्द्रीय विद्यालय में शिक्षक की नियुक्ति होते ही मखावन लाल की शादी पिछले वर्ष हुई.. भौजाई के रूप में सौन्दर्यमय प्रेम का न केवल पुनर्जन्म हुआ बल्कि रति की पराकाष्ठा भी प्राप्त हुई.. जयमाल वाली फोटो पर हमने बधाई कमेंट किया था.."कस्तूरी कुंडली बसे..." आजकल हर दिन फोटो अपलोड होती है.. शायरियाँ लिखी जाती हैं, नगमे समर्पित किये जाते हैं.. सुनैना जी का तो पता नहीं, पर कभी कभी हमारा अवैवाहिक दिल जरुर दुःख उठता है.. मखावन सर ऐसे ही रोज रोज फोटो अपलोड करते रहें, सत्यनारायण भगवान् से यही हमारी प्रार्थना है.. बोलो वृन्दावन बिहारी लाल की जय..
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