ये सरसों और अलसी के साइज़ की कोठिली है.. पर बसावन की पतोहू इसमें चावल रखेगी.. जैसे-जैसे घरों में बंटवारे होते चले जाते हैं, कोठिली की साइज़ छोटी होती चली जाती है.. अपने जमाने में सिवान से मिट्टी ढो के घर लाना गर्मी की छुट्टियों का बेहतरीन टाइम पास होता था.. माँए खुले से आँगन में, खलिहान में मिट्टी में थोड़ा सा भूसा मिलाके ख़ूबसूरत कोठलियाँ गढ़ दिया करती थीं.. आषाढ़ की पहली बूँद से पहले उस पर तीन बार गाय के गोबर से लिपाई हो हाती थी.. अनाज सालों साल सुरक्षित रहता था..
समय की चाल में मोबिल के ड्रम, स्टील के कंटेनर, नयासा, सेलो और तमाम ब्रांडों के प्लास्टिक जारों ने भारतीय रसोई और इसके रसद विभाग पर आधिपत्य कर लिया.. पर आज भी कोठिली को जिन्दा रखने के लिए बसावन चाचा की गुनी पतोहू को पन्ने की तरफ से ढेर सारा प्रणाम..

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