मंगलवार, 27 सितंबर 2016

संस्कार

लौंडों ने संस्कार के नाम पे बस इतना ही पाया है कि अपने पैसे से खरीदे हुए आइटम के दाम भी बाप को आधा करके बताते हैं, वो भी सिर्फ पूछने पर.. 


जिंदगी के फंडे

जिंदगी के फंडे उस दिन क्लियर हो जाते हैं, जिस दिन किसी देह का पोस्ट मोर्तेम होता देख लो, स्वाद की दीवानी जीभ शांत रहती है.. भोजन का संचय करती वही कुछ अंतड़ियाँ निष्ठुर सी जो बाहर निकाल दी जाती हैं, आज-कल-कैरियर-बैंक-बैलेंस से अनभिज्ञ ठगा सा मृत मष्तिस्क, जो अपने जीवन में हमे हर पल मारे रहता है.. संवेदनाओं से परे रक्त का एक पम्पिंग सिस्टम, दिल, जिसने पूरी जिन्दगी आपका चुतिया काटा होता है.. बस इतना सा ही.. सब एक हमाम में नंगे हो जाते हैं उस दिन.. फिर एम्बाल्मिंग होती है.. ढांचा सिल दिया जाता है.. अपने अपने तरीके से उस ढाँचे से निपट लिया जाता है.. फिर वही पांच तत्व शेष रह जाते हैं..


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बारीक़ बाल

भला हो हनी सिंह और जॉन सीना का..
जिसने आज के बच्चो को फैशन के नाम पे बाल बारीक़ छोटे रखना सीखा दिया..
हमारी तो सबसे ज्यादा कुटाई ही बालो को लेके हुई थी। हम दिलजले के अजय देवगन बनके घूमते थे,
और जिस दिन पापा के हाथ लग जाते उस दिन नाईं की दुकान से ओमकारा का लंगड़ा त्यागी बनाके ही घर लाते थे|

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शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

"तथा कथिक अच्छे दिन "

दृश्य संख्या -१

मंगरू रोड किनारे फ्रेश होने बैठा है । साथ में १० फ़ीट की दूरी पे सुमेरू भी बैठा है ।माथे पे शिकन लिए हुए  दोनों को एक ही बात की चिंता  खाये जा रही है कि अच्छे दिन आख़िर कब आएंगे ।


दृश्य संख्या -२

मिस्टर क किसी ज़रूरी काम से शहर मुख्यालय की ओर जा रहे है और अचानक लघुशंका की दस्तक पे सड़क का एक किनारा पकड़ लेते हैं हलके होने के लिए । उन्हें भी यही सवाल गुदगुदी कर रहा है कि अच्छे दिन आख़िर कब आएंगे ।


दृश्य संख्या -३


राम दुलारे के प्रश्न के प्रत्युत्तर में बिलोचन ने आधे घंटे से बने  पान मसाला के लबाब को पिच्च से बगल में थूका और कटाक्ष किया "अबे काहे के अच्छे दिन"


दृश्य संख्या -४


रिश्वत  के तौर पर लिए गए १० -१० की १५ नोट गिनते हुए मिस्टर  ख ने  " १५ लाख अकॉउंट में नहीं आने वाले  "  कहते हुए शर्मा जी को समझाया कि यही अच्छे दिन है की डेढ़ सौ में फील आगे पहुच रही है ।



ऐसे हज़ारो दृश्य है जहाँ भारतीय लोग अच्छे दिनों वाले ज़ुमले को कोस रहे हैं ।



पर उपदेश कुशल बहुतेरे 





संघवाद (फेडलिज़्म) : संवैधानिक राजसंचालन की एक प्रवृत्ति

संघवाद


संघात्मक संविधान की विशेषताएँ

संघात्मक संविधान में निम्नलिखित विशेषताएँ अपेक्षित होती हैं :
  • प्रथम, राजनयिक शक्तियों का संघीय एवं राज्य सरकारों के मध्य संवैधानिक विभाजन, द्वितीय, संघीय संविधान की प्रभुसत्ता अर्थात् प्रथम तो न संघीय और न राज्य सरकारें संघ से पृथक् हो सकती हैं।
  • द्वितीय, संघात्मक संविधान उन दोनों से समान रूप से सर्वोपरि होता है।
  • तृतीय, चूंकि संघीय एवं राज्य सरकारों के मध्य अधिकारों का स्पष्ट विभाजन होता है, अत: संघात्मक सविधान का लिखित होना भी आवश्यक है।
  • चतुर्थ, संघात्मक संविधान संघीय एवं राज्यसरकारों के समझौते का अंतिम रूप से पुष्ट करता है। अत: ऐसे संविधान का व्यावहारिक रूप से अपरिवर्तनीय भी होना अपेक्षित है। कम से कम किसी एक पक्ष के के मत से ऐसा संविधान परिवर्तित नहीं किया जा सकता। संविधान का परिवर्तन विशिष्ट परिस्थितियों में विशिष्ट प्रक्रिया द्वारा ही किया जा सकता है।
  • पंचम, किसी भी प्रकार के विवाद जो संघीय एवं राज्य सरकारों के बीच में संवैधानिक कार्यसंचालन में कर्तव्य, अधिकार अथवा साधनों के विषय में आ गए हों तो उनके निर्णय के लिए न्यायालय को सविधान के संघात्मक प्रावधानों की मींमांसा करने का पूर्ण एवं अंतिम अधिकार दिया जाना चाहिए।
इन विशेषताओं के साथ संघात्मक संविधान का एक आदर्श प्रारूप संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान है जिसका निर्माण सन् 1787 में 12 स्वतंत्र राष्ट्रों की संविदा के अनुसार हुआ था। इसके पश्चात् कनाडा,आस्ट्रेलिया, जर्मनी एवं फ्रांस इत्यादि के संघात्मक संविधानों का निर्माण हुआ। भारत का संविधान भी, जो सन् 1950 से लागू हुआ, संघात्मक संविधानों का एक नवीन दृष्टांत है।

भारत : संघात्मक या एकात्मक

प्रधानत: भारत के संविधान में संघात्मक संविधान की सभी उपर्युक्त विशेषताएँ विद्यमान हैं। किंतु भारतीय संघात्मक संविधान में कुछ विशिष्ट प्राविधान है जिनका समावेश अन्य संविधानों के कार्यसंचालन से उत्पन्न कठिनाइयों को दृष्टिगत करके किया गया है।
उदाहरणार्थ, सबसे विशिष्ट तथ्य यह है कि भारतीय संविधान संघात्मक होते हुए भी इसका निर्माण स्वतंत्र राष्ट्रों की किसी संविदा द्वारा नहीं हुआ है; बल्कि यह उन राज इकाइयों के मेल (यूनियन) से बना है जो परंतंत्र एकात्मक भारत के अंग के रूप में पहले से ही विद्यमान थे। दूसरी विशेषता यह है कि आपत्काल में भारतीय संविधान में एकात्मक संविधानों के अनुरूप केंद्र को अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए प्रावधान निहित हैं। तृतीय विशेषता यह है कि केवल एक नागरिकता (भारतीय नागरिकता) का ही समावेश किया गया है तथा एक ही संविधान केंद्र तथा राज्य दोनों ही सरकारों के कार्यसंचालन के लिए व्यवस्थाएँ प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त संविधान सभा के मतानुसार भारत एक शिशु गणतंत्र की अवस्था में है, अत: देश के तीव्र एवं सर्वतोमुखी विकास एवं उन्नति के लिए समय समय पर उपयुक्त प्रावधानों की आवश्यकता पड़ सकती है जिसके लिए संविधान संशोधन की तीन विभिन्न प्रक्रियाएँ दी गई हैं। केवल विशेष संघात्मक प्रावधानों के संशोधन के लिए ही राज्यों का मत आवश्यक है, बाकी संशोधन संसद् स्वयं कर सकती है। इस प्रकार संघात्मक संविधानों के विकास में भारतीय संविधान एक नई प्रवृत्ति, केंद्रीकरण, का सूत्रपात करता है।

स्रोत - wikipedia 

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

सानिध्य


गर्मी की भयावह दोपहर में रायबरेली से लखनऊ तक का सफ़र.. उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की एक्स्ट्रा आर्डिनरी बस.. ड्राईवर के बगल में लंबवत लंबी स्टाफ सीट.. सीट पर बैठा मैं.. पीठ पर बनियान को चीरता मेरा पसीना.. धूप में रुकी हुई बस.. लोगों के खट्टे पसीने की गंध.. दो डाकुओं का आगमन.. अच्छे वाले डाकू का मेरे बगल में आके बैठना.. मतलब कुल मिला जुला के फॉग चल रहा है..
आते ही "ओह इट्स टू वार्म"
मेरे मुंहफट मुंह से अनायास ही निकल जाता है "ग्लोबल वार्मिंग"
कन्या ने हलकी सी मुस्कराहट के साथ दर्शाया कि वह प्रगतिशील सोच की है.. (कल्पना मात्र: उसने मुंह ढका हुआ था)
प्रगतिशीलता पे असल मुहर तब लगी जब उसने मुझसे मेरा गंतव्य पुछा.. बस अपने अड्डे से निकल गयी.. आगे बाएँ मुड़कर जब उसने राजमार्ग पर अपने टायर रखे तो सूर्य की चिलचिलाती किरणों ने हम दोनों पीठ पर मानो अंगारे रख दिए.. कन्या ने अपना हैंडबैग की चेन खोली.. एक बड़ा सा काला चश्मा निकाला.. इतना बड़ा गूगल मैंने कभी नहीं देखा था.. उसके बाद कन्या ने दो घूँट पानी पिया.. फिर उसी बैग से चर्मवर्णी दस्ताने निकाले.. ये वही दस्ताने थे, जिन्हें कन्याएँ स्कूटी आदि वाहनों पर पहनती हैं.. लंबे दस्ताने एक एक करके चढ़ाये जा रहे थे.. मैं सोच रहा कि कन्याओं के लिए किसी का खून करना कितना आसान है.. चेहरा भी ढक लो, दस्ताने भी पहन लो.. सीसीटीवी और फिंगर प्रिंट की कोई समस्या नहीं.. इतने नजदीक से तिलस्मी दस्ताने वाक़ई मैंने पहली बार देखे थे, इसीलिए मैं अपलक उन्हें देखता रहा.. गनीमत थी कि कम से कम आज मैंने स्नान किया था और साफ़ कपड़ों का भी आज पहला दिन था.. कन्या के चश्मे और दस्ताने का पीठ पर आती धूप से क्या सम्बन्ध था, इस बात को समझने के लिए आइंस्टीन को फिर से जीवित होना पड़ता..रूप का नहीं पता पर अखंड विरह रंडवोँ हेतु बगल वाली सीट पर कन्या का बैठा होना ही इतनी ख़ुशी और रोमांच से भर देता है मानों कन्या बगल वाली सीट पर नहीं वरन् जीवन में ही आ गयी है.. और अगर आते ही कन्या ने आपसे ज़रा सी भी बात कर ली तो मानो मोक्ष ही मिल गया है.. अब स्वात्मा और परात्मा के मिलन को कोई नहीं रोक सकता.. मौका एक प्रतिशत ही होता है, प्रयास उसे शतांक की श्रेणी में लाते हैं.. रूप, वेशभूषा सब गौण हैं, रंडत्व सिर्फ प्रेम का भूखा होता है प्रेम के स्त्रोत का नहीं.. अतः दर्शन की चेष्टा हृदय में ही सुषुप्त है.. 
कन्या अभी भी अस्त-व्यस्त है.. मोबाइल अभी बैग में ही है और कन्या केवल उसकी कानखोंसनी निकाल के कानों में लगा लेती है.. चिलमन के अंदर ही अंदर इयरफोन कान में प्लग करके लेट्स द म्यूजिक प्ले हो जाता है.. मेरे समान्तर बैठी कन्या की जिंदगी चायना मोबाइल जैसी है और मैं नोकिया ग्यारह सौ सा चुपचाप बैठा हूँ.. मुझे पता है कि वह कन्या न केवल मेरे लिए अपितु मेरे इर्द-गिर्द बैठे प्रत्येक पुरुष मतदाता हेतु आकर्षण का विषय है.. परंतु लोगों का मुझसे द्वेष सिर्फ इस लिए है क्योंकि कन्या यदृच्छया मेरे बगल में आ के बैठ गयी, जबकि मैंने तो कोई डियो भी नहीं लगाया था.. हमारे एक बजे की लाइन में एक दम्पत्ति बैठी है.. जवानी में ही सिर के सभी बाल गँवा चुके पति कन्या के चश्मे को बेतहाशा खाऊ निगाहों से घूरे जा रहे हैं, वो उनकी पत्नी महोदया गर्दन उचका उचका के हमारे बीच की विभाजन रेखा की घटती बढ़ती दूरियों का मापन कर रही हैं.. जब जब यह दूरी शून्य होती है और कन्या और मेरे बदन के बीच अपरिहार्य घर्षण होता है, उनकी पलके खींच जाती हैं और पुतलियाँ आकार में बढ़ जाती हैं.. और उनकी नज़रों में मैं अभियुक्त हो जाता हूं.. कुछ प्रतियोगी नौजवानों की आँखों में तो मैं अपने लिए साक्षात मौत देख रहा हूँ.. ऐसा लग रहा मानों कन्या के बगल में बैठते ही मैं लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष बन गया हूँ.. या उनका लॉजिक कुछ ऐसा होगा.. जीवन भी सफ़र सा है.. दोनों में बहुत कुछ उभयनिष्ठ है.. जीवन के साथी को हम भ्रम में हमसफर कहते हैं.. जबकि ख़त्म तो जीवन को भी होना है और सफ़र को भी.. दोनों के ही अंत में तन्हाई और ठप्रेक है.. इसलिए यदि आपके किसी सहयात्री के बगल में कोई कन्या आ के बैठ जाए तो वह उतना ही दुखदाई होता है जितना मोहल्ले के किसी लौंडे को तगड़ी दुलहिन मिलने पर होता है.. कुल मिला जुला के मेरी किस्मत ज़माने को खटक रही है.. खटकने दो.. मैंने ठेका लिया है क्या.. शेष कुंठित सहयात्रियों का अवलोकन मैं नहीं करना चाहता.. कस्तूरी कुंडली बसै वाली बात हो जायेगी.. कन्या ने हरकत समाप्त कर दी है.. शायद सो गयी हो.. पर इतने सघन काले शीशे के अंदर कन्या की आँखें समझ में भी तो नहीं आतीं.. मुझसे क्या? हर मोड़ पर, ब्रेक लगते ही, एक्सीलेटर खींचते ही, मतलब हर उस बिंदु पर जहाँ जड़त्व या आघूर्ण उत्पन्न होता है, कन्या और मेरी न्यूनतम दूरी शून्य हो जाती है.. एक दो बार कन्याअ ने मेरे कंधे पे नींद मेंअपने सिर भी मारे.. रंडत्व की पवित्रतम प्रतिपूर्ति हो रही है.. ये सफ़र ही जीवन है.. तन्मय अभिलाषाओं की चाह नहीं.. बस ये ब्रेक लगता रहे, एक्सीलेटर चँप्ता रहे, मोड़ आते रहें.. मैं भी हलकी नींद में हूँ.. 
पर कन्या जाग गयी है.. बैग में कुछ हलचल हुई है.. अबकी बार पानी की बोतल है.. दर्शन की सुषुप्त अभिलाषा जागृत हो उठी है.. पर कन्या ने इस बार भी बोतल और मुंह का संपर्क चिलमन के अंदर ही अंदर बना लिया, प्यास तृप्त हुई.. पर मेरी नहीं..(छिछोरे पाठक अतिक्रमण से बचें) 
बोतल अंदर.. फोन बाहर.. कन्या ने दास्ताने पहने पहने ही कैसे टच स्क्रीन चलाया.. "क्या ऐसा कोई स्क्रीन भी आता है क्या जो दस्ताने वाली उँगलियों से भी चलता है?" दर्शन की चाह पर ये सवाल भारी पड़ा.. और मैंने अतिउत्साह में कन्या से पूछ ही लिया.. "एक्सक्यूज़ में! हाउ कम यू आर ऑपरेटिंग द स्क्रीन विथ ग्लव्स?" ये अनलाइक लंठ था.. अनबिकमिंग लंठ था.. पर अंग्रेजी के दो कारण थे.. पहला- कन्या के आगमन का सीन और उसके हाथ में मँहगा वाला फोन देख के हिंदी बोलना असहज सा लगा.. दूसरा- मैं नहीं चाहता था कि मेरे सवाल को कोई तीसरा समझे.. बेशक वहां अंग्रेजी समझने वाले और भी लोग होंगे.. प्रतियोगी भाई लोगों को सीसैट भर की अंग्रेजी तो आती ही होगी.. पर जितनी खूबसूरती से अशोक लेलैंड की आवाज में अंग्रेजी घुल मिल जाती है, शायद ही हिंदी में वो क्वालिटी हो..
मेरी सारी प्रमेय को कन्या ने चोखा साबित करते हुए अपना मुख मेरे कान के पास लाके कहा "आँय??" और मुझे भक मार गया.. सँभलते हुए मैंने उससे पूछा, "ये फोन कपड़वा से भी चलता है क्या".. तभी कन्या ने अपनी दस्तानेयुक्त तर्जनी ऊँगली मुझे दिखाई.. मेरे रंडत्व ने जो देखा वो था- गोरा बदन, स्पार्कल वाली सुनहरी नेलपॉलिश,बढ़े हुए नाख़ून जिन्हें बड़ी नज़ाकत से बेरंग छोड़ा गया था.. और मैंने जो देखा वो था- बड़ी ख़ूबसूरती से कन्या ने अपनी तर्जनी ऊँगली के शीर्ष पर एक सेमी के व्यास में दस्ताने को फाड़ा हुआ था.. ये एकमात्र ऐसी जगह थी जहाँ से कन्या सीधे हवा के संपर्क में थी.. हम दोनों हँस पड़े.. हमारे चेहरों पर लंबी सी मुस्कान खींच आई.. और आस पड़ोस में ऐसा मातम छा गया मानो कन्या में मुझे आईलाभ्यू बोल दिया हो..

कोठिली

ये सरसों और अलसी के साइज़ की कोठिली है.. पर बसावन की पतोहू इसमें चावल रखेगी.. जैसे-जैसे घरों में बंटवारे होते चले जाते हैं, कोठिली की साइज़ छोटी होती चली जाती है.. अपने जमाने में सिवान से मिट्टी ढो के घर लाना गर्मी की छुट्टियों का बेहतरीन टाइम पास होता था.. माँए खुले से आँगन में, खलिहान में मिट्टी में थोड़ा सा भूसा मिलाके ख़ूबसूरत कोठलियाँ गढ़ दिया करती थीं.. आषाढ़ की पहली बूँद से पहले उस पर तीन बार गाय के गोबर से लिपाई हो हाती थी.. अनाज सालों साल सुरक्षित रहता था.. 


समय की चाल में मोबिल के ड्रम, स्टील के कंटेनर, नयासा, सेलो और तमाम ब्रांडों के प्लास्टिक जारों ने भारतीय रसोई और इसके रसद विभाग पर आधिपत्य कर लिया.. पर आज भी कोठिली को जिन्दा रखने के लिए बसावन चाचा की गुनी पतोहू को पन्ने की तरफ से ढेर सारा प्रणाम..

सुनो सबकी, करो अपने मन की..


इस लोकोक्ति के द्वितीय पक्ष को ज्यादा प्रधानता दी जाने लगी है.. मृत भावनाओं की अंधी दौड़ में भागते लोग अपनी बात रखने के लिए इतने उतावले हो उठते हैं कि उनका सम्मुख व्यक्ति क्या कह रहा है , वो सुन ही नहीं पाते और अपनी भावी असंगत प्रतिक्रिया को अपने ही मस्तिष्क में सजाने संवारने में सामने वाले व्यक्ति की कही जा रही बातों को प्रारम्भ से ही विस्मृत कर देते हैं.. न सुनने की ज्यादा समस्या उन्हें होती है जो व्यक्ति आत्ममुग्ध रहते हैं..
सुनने का पक्ष ज्यादा प्रबल होता है.. "करो अपने मन की" संवाद के समाप्त हो जाने के बाद की प्रक्रिया है, यह कर्मणा पक्ष का अवयव है.. पर "सुनो सबकी" संवाद की आत्मा है, यह मनसा पक्ष का अभिसार है.. मनसा और कर्मणा के मध्य वाचा पक्ष है, जो आजकल अभिव्यक्ति की ठिठोली पे तर्क से सम्बन्ध तोड़ रहा है.. सम्मुख व्यक्ति को जब सुना है तो अपनी बात समाप्त हो जाने के बाद वह भी आपकी बात को उतनी ही तन्मयता और समर्पण के साथ सुनता है.. सूचना क्रांति के दौर में सबसे दुखद यह है कि अधिकतर लोगों के मन में ये धारणा बैठ गयी है कि वही सही हैं, शेष गलत हैं.. और अपने सही को सही मनवाने की होड़ मची हुई है.. इसी होड़ को ख़ामोशी का मुक्का मारना है.. सुनना है.. क्या पता सामने वाले की मनसा वही हो जो आपकी हो, और कर्मणा उभयनिष्ठ हो जाए..

पावरोटी

बासी मुंह चाह... दंतवा गला देगी बबुआ..कौन फेरा में हो...
कोने से अम्मा ने सफाई दी-तेजपात डाले हैं...
बाबूजी फिर बोले-तो वो कौन सी नीम है वो कितनी बार कहे हैं इनको चीनी वाली चाय की आदत मत डालो.. 
दुकान की कठोर पावरोटी चाय में डूब चुकी थी...सरंध्र छिद्र चायमय हो चुके थे, काठ सी पावरोटी भींग के सोंधी महक के साथ आमंत्रित कर रही थी..ऐसे में दांत मांजना पावरोटी के सौम्य व्यवहार के साथ अन्याय था 
बाबूजी की नजर पावरोटी पे पड़ी... इ बीमारी का घर कहाँ से कीने हो? लात से मैदा सान के तीन दिन सड़ाते हैं फिर बनाते हैं..
पूरा माहौल किचाईन हो उठा.. कटोरी में चाय के स्तर से इंच भर ऊपर पावरोटी का आधा गीला हिस्सा नजरों के सामने था जो अब लटक के वापस कटोरी में गिरने ही वाला था... इसका स्वाद मुंह में जाने से पहले ही मिलना शुरू हो गया था... कुटाई तय थी अगर मूंह में जाता... सुबह इतना सन्नाटा....बाबूजी ने पॉज कर दिया... ग्रीन सिग्नल की उम्मीद बेकार थी..पावरोटी का तारणहार सुन्न था...गर्दन को मोड़के करुण ह्रदय से देखा... सबेरे का पहला आहार पस्त हो गया... बाबूजी जा चुके थे... रसोई की तरफ कदम दौड़ पड़े...चम्मच नामक वस्तु न मिली...छोटी कलछुल ने चाय में डूबी आधी पावरोटी का रेस्क्यू ऑपरेशन किया और गंतव्य तक पहुँचाया ... स्वाद था पर करारापन नहीं... आगे की कसक हाथ में रह गये आधे हिस्से ने पूरी की....

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

उदारीकरण की नीतियाँ और दण्डित करने की शक्ति


उदारीकरण की नीतियाँ हमेशा सुखद नहीं होतीं। कठोर फैसले लेने नितांत आवश्यक हैं और उनकी आवश्यकता तब और बढ़ जाती है जब मुद्दा राष्ट्र की सम्प्रभुता और अखंडता को सजोने का हो। कम्युनिस्ट इस राष्ट्र की नीतियों से खुश नहीं हैं, आतंकवाद इस देश की धर्मनिरपेक्षता से, कुछ लोग इसकी सीमा रेखा से खुश नहीं हैं और कुछ को तो संविधान में ही विश्वास नही है । तो क्या राष्ट्र तुष्टिकरण की नीति पे चले और सबकी नाराज़गी और घृणा को स्थान देके के फ़ैसला ले। राष्ट्र विरोधी घटनाओं की भर्त्सना ही एक मात्र विकल्प क्यों दिखता है हमें या हमारे राष्ट्र के नुमाइंदों को और उसमे से भी कुछ तो खुल के विरोध भी नहीं कर पाते। निंदा करते रहिये और थोपते रहिये आक्षेप दूसरे पर परन्तु ये असहनीय है की आप की स्वतंत्रता और स्वछ्न्दता की क़ीमत हर बार कुछ लोग ही चुकाएँ और वो भी अपने प्राण देकर । रात को बियर के चुस्की , मल्टीप्लेक्स थिएटरों में पॉपकॉर्न के साथ फिल्मों का आनंद, रेस्त्रा में पिज़्ज़ा और बर्गर के स्वादिष्ट टुकड़ों, टीवी के स्वयंवरों और निज़ी सम्बन्धों की ऐच्छिक सार्वजनिक छीछा -लेदर का सुलभ दर्शन आपको सौगात में नहीं मिलें है। दूर कहीं उसकी एक बड़ी कीमत चुका रहे हैं हमारे अपने ही लोग 


जन मानस के एक वर्ग को तो फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनके नज़रिये काल्पनिकता से ओत - प्रोत है जिसमे विडियो गेम का एक हीरो सारी समस्याओं को हल कर देता हैं और उस मानसिकता में रिसेट का विकल्प हमेशा रहा है 
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फर्क हमें पड़ता है क्योंकि हमें इतिहास पढ़ाया गया है प्राथमिक विद्यालयों में जिसमें अनगिनत हीरो थे, सदियों का संघर्ष था और रिसेट का कोई विकल्प नहीं। 


हमें विकसित राष्ट्र के लिए एक निरंतर विकासशील नज़रिया चाहिए जिसमे सही को सही और ग़लत को ग़लत कहके उसे दण्डित करने की शक्ति हो।

विरक्ति बनाम आसक्ति

मखावन लाल जी, बहुत होनहार किस्म के छात्र थे.. उस जमाने में हम सब उनको बड़े अदब से सुनते थे.. उनके नाम के कई पर्यायवाची थे.. इनसाइक्लोपीडिया, सर्च इंजन, हर्बेरियम इत्यादि.. बीए में जबसे युनिवेर्सिटी टाप किया था लोगों के बीच तगड़ी साख बन गयी थी.. पूर्वांचल से अवध, रूहेलखंड से बुंदेलखंड प्रत्येक टोली ने उन्हें जी भर के सम्मान दिया.. छात्रावास के आधे छात्रों के लिए वो चलती फिरती सामान्य ज्ञान की किताब थे.. कई लोगों के लिए उनका पैंतालीस मिनट का सानिध्य दिल्ली की सिविल सेवा की कोचिंग के समान था.. समसामयिकी की बात करें तो बगल के चौराहे से लेकर संसद तक, यूनिवर्सिटी की क्रिकेट टीम से लेकर बीसीसीआई की अंतरिम बैठकों तक, मिर्जापुर के कट्टों की फक्ट्रियों से लेकर डीआरडीओ- इसरो तक की नियमित पड़ताल करते थे.. ज्ञान में कल्पना और सृजनशीलता का छौंका तो था पर घमंड कत्तई नहीं.. ऊपर से जुगाड़ भर की अंग्रेजी उनके व्यक्तित्व को समग्रता प्रदान करती थी.. भूगोल और मानव विज्ञान में उन्हें विशेष योग्यता थी.. जीवन का बस एक ही लक्ष्य था अध्यापन, जिसकी पूर्वगामी प्रैक्टिस वो दुसरे अन्तेह्वासियों के कमरों में जा कर किया करते थे.. उनकी इस अध्यापन कला को दुनिया डीलिंग के नाम से जानती थी और उन्हें लोग प्रेम और सम्मान से डीलू कह कर पुकारते थे.. अपने कक्ष में उन्होंने कभी भी कोई ज्ञानोपदेश नहीं दिया..
सर्व गुण सम्पन्नता बड़ी खतरनाक चीज होती है.. टैलेंटेड लोगों से कन्याएं प्रायः बिदकती हैं.. पर उनके जीवन में करने के लिए इतना कुछ था कि किसी कन्या को समय निकाल के देना उनके लिए अपनी किडनी समर्पित करने के समान था..
पर उस जमाने में यूनिवर्सिटी में कमाल का माहौल होता था.. ग्रेजुएशन में कैंपस में कन्या- युवक के बीच ऐसा प्रतिकर्षण होता था मानो चुम्बक के समान ध्रुव हों.. गाँव से आये लौंडे तीन साल अपना व्यक्तित्व निखारते थे..जाकी की चड्ढी और अडिदास के जूतों से सफ़र की शुरुआत होते होते ब्रीलक्रिम और गार्नियर मेंस फेसवाश तक पहुँच जाती थी.. नाड़े वाला चड्ढा तवा पोंछने के काम आता था.. लौंडों के अंदरूनी आकर्षण का आलम ये था कि कन्या से भले ही पिछले अढ़ाई वर्ष में कोई बात नहीं हुई हो परन्तु बाकि मित्र उसे अपनी भाभी ही मानते थे और उसकी रक्षा को तत्पर रहते थे.. यदि किसी और कंटक ने उस पुष्प का पीछा किया तो इसकी कीमत उस कांटे को टाँके लगवा के चुकानी पड़ती थी..
ग्रामीण अंचल से आईं राजकुमारियाँ अपना रंग निखारती थीं.. फेयर एंड लवली और पोंड्स से ऊपर उठकर कुछ नया ओले टाइप का ट्राई करती थी.. शुरू शुरू में तो घरवालों का विश्वास और आत्मविश्वास की लड़ाई में घरवालों का भरोसा हावी रहता था.. महिला छात्रावास में तो मस्तिस्क की चोटियाँ खुलने में एक वर्ष लगता था.. परन्तु कालांतर में उन्होंने भी नाख़ून बढ़ा लिए.. रंग बिरंगी नह्पलिशों को लगाकर खुद को तितली और एंजेल अवतार लिया.. उधर गाँव से आया मनोहर भी मनु बन चूका है.. पूर्व के ऑक्सफ़ोर्ड में डीन ऑफिस के सामने खड़ा आईडी के कैनवास जूतों और मुफ़्ती की आधी बांह की बुस्कर्ट पहने बीए थर्ड इयर में वो भी इंजीनियरिंग टाइप की यूरोपीय फीलिंग लेता है.. 
कहानी पे वापस आते हैं.. इस भौतिक प्रगति से दूर इस कहानी का हीरो अपने में मस्त है.. ओवरआल डिस्टिंक्शन में बीए पास करके एम्ए में एडमिशन ले चूका है.. पर एमए में बड़ा खुला खुला माहौल है.. ग्रेजुएशन में तो ऐसा लगता था मानों अगर किसी बालक ने किसी कन्या से बात कर ली तो दोनों को संक्रामक बीमारी हो जायेगी पर अब ऐसा नहीं है.. नए माहौल में नये मित्र मिलते हैं.. अब मित्र का दायरा विस्तृत है.. कुंठित और संकुचित परिभाषाएं खंडित हो चुकी हैं.. अभी राधिका टिफिन लाती है तो उसमे सुरेश और गोपाल दोनों खाते हैं.. लैंगिक वैमनस्य समाप्त हो चूका है.. झगड़ा होता है तो रत्ना देवी रामसजीवन को पीठ पे मुक्के भी मार देती है.. ग्रेजुएशन टाइम में तो रामसजीवन रत्नादेवी की आवाज को भी तरसते थे.. रजाई में कितनी ही बार उसके नाम से कैवल्य प्राप्त कर चुके थे.. पर अब पोस्ट ग्रेजुएशन है.. यहाँ तुच्छता और लैंगिक अश्यपृश्यता का कोई स्थान नहीं.. कैंपस में तो पूरा जेएनयू टाइप माहौल है.. भले ही ऑफ कैंपस समस्त रंडत्व रिस्टोर हो जाए... पर हमारे हीरो मखावन लाल को न पहले कन्या में इंटरेस्ट था और न ही वो आधी आबादी के साथ क्लास में सीट साझा करने के इच्छुक हैं.. हँसते मुस्कुराते आते हैं, पूरी तन्मयता के साथ लेक्चर सुनते हैं, डिस्कशन करते हैं और फिर वापस छात्रावास में डीलिंग करने चले जाते हैं.. मखावन लाल के इसी स्प्राइट अंदाज के सभी कायल थे.. परन्तु आसक्ति जब टूटती है तो विरक्ति लाती है..विरक्ति जब टूटती है तो आसक्ति लाती है.. 
पिछले तीन सालों में कन्या में दिलचस्पी न रखने वाले मखावन को एक नयी कन्या सुनैना ने अपने पहले ही दिन अपना दीवाना बना दिया.. हफ्ते भर के अन्दर मखावन जी की रिंग टोन से लेकर कॉलर टोन सब बदल गयी.. उनकी दीवानगी सुनैना के टैलेंट के प्रति थी.. परन्तु चैतन्य का दीवाना अपनी जड़ सजा रहा था.. फेसपैक लगने लगे.. डाबर से लेकर भीयलसीसी तक सब घंसाने लगा.. एक शौक़ीन जूनियर के कमरे में घंटों पुरुष सौन्दर्यवर्धन की संगोष्टियां होतीं.. न केवल पुरुष सौन्दर्य अपितु उस कन्या विशेष की पसंद को ख्याल रखते हुए अगले सप्ताह तक की श्रृंगार पटार योजनायें तैयार कर ली गयीं.. परिश्रम का फल तो मिला.. चेहरे की रौनक बदल गयी.. पर जिस साध्य हेतु यह सौन्दर्य साधना की गयी थी वो चाँद था.. वह चाँद पहले से ही किसी और सूरज की रौशनी से गुलजार था.. अन्तोगत्वा चकोर के श्रृंगार ने रति की बजाय बिरह को आत्मसात किया.. चक्रार्ध में आसक्ति से पुनः विरक्ति का चक्रण हुआ.. ये चक्रण ही एकमात्र सत्य है.. पर कथा यहाँ समाप्त नहीं होती.. चक्र अभी शेष था..
केन्द्रीय विद्यालय में शिक्षक की नियुक्ति होते ही मखावन लाल की शादी पिछले वर्ष हुई.. भौजाई के रूप में सौन्दर्यमय प्रेम का न केवल पुनर्जन्म हुआ बल्कि रति की पराकाष्ठा भी प्राप्त हुई.. जयमाल वाली फोटो पर हमने बधाई कमेंट किया था.."कस्तूरी कुंडली बसे..." आजकल हर दिन फोटो अपलोड होती है.. शायरियाँ लिखी जाती हैं, नगमे समर्पित किये जाते हैं.. सुनैना जी का तो पता नहीं, पर कभी कभी हमारा अवैवाहिक दिल जरुर दुःख उठता है.. मखावन सर ऐसे ही रोज रोज फोटो अपलोड करते रहें, सत्यनारायण भगवान् से यही हमारी प्रार्थना है.. बोलो वृन्दावन बिहारी लाल की जय..

गांव की रामलीला

एक दौर था कि शाम 7 बजे के बाद जैसे ही रामलीला मैदान (जो कि हमारा प्राथमिक स्कूल भी था ) से निकली हारमोनियम की आवाज़ कान में पड़ती थी , अध्ययन के लिए जलाये गए लालटेन को बुझा देने को मन कुलबुलाने लगता था । हर रोम से यही कामना होती थी कि अब छोटे पापा (चाचा जी ) स्वीकृति दे दें कि लालटेन बंद कर के घर जाओ । घर जाके जल्दी जल्दी १-२ रोटियों को निगलने के बाद हम बोरी और ओस से बचने के लिए शाल लेकर स्कूल की ओर उड़ पड़ते थे । दर्शक दीर्घा की पहली कतार में जगह बिछने (चुनने ) की होड़ सी थी  हमउम्र साथियों में ।
राम लीला में पाठ (पात्र और अदाकारी) को लेकर मन के अंदर अजीब सी भावना हुआ करती थी। खिड़कियों से झाँक झाँक कर मेकअप करते कलाकारों को देख कर हूक सी उठा करती थी । चरित्र निभाने वाले कलाकारों में कुछेक सदस्य परिवार के होते थे फिर भी हमें मेकअप कक्ष में दाख़िल होने की कोई वरीयता नहीं मिलती थी । इन सारी उत्सुकताओं की वजहों में एक वजह ये भी थी कि समापन के दिन हर कलाकार को मेकअप कक्ष में मिठाई मिलती थी और मंच पे पुरस्कार स्वरुप बनियान । हालाँकि आगामी वर्षों में ये दर्द जाता रहा और मुझे भी भूमिकाओं को निभाने के प्रस्ताव मिलने लगे । चूँकि मुझे राग , लय , सुर की समझ कम थी तो पद्य वाले पाठ नहीं मिलते थे जिनमे बहरत हुआ करती थी । गद्य पाठ में माहिर होने के कारण हमें शत्रुघ्न, वाल्मीकि, समुद्र , सुषेन वैद्य या ऐसे ही किसी चरित्र को निभाने की जिम्मेवारी मिलने लगी । आखिरी ४ दिनों की लीला में "रावण" का किरदार न मिलने का मलाल आज भी है मन में 
मुझे किसी मंच पे बोलने की प्राथमिक शिक्षा अपने गांव की रामलीला के मंच से ही मिली है और मैं इस बात के लिए सदा आभारी रहूँगा ।
मैं अपने क्षेत्र , गाँव के हर युवा साथी से ये अपील करना चाहूँगा कि अपने व्यवहार, सहयोग, निष्ठा ओर आध्यात्म की भावना से आगामी वर्षों की राम लीला की सार्थकता बनाये रखें ।

अढ़ाई सौ का साउंडबॉक्स

सन १९९८
बड़े बुजुर्गों के मरने के बाद गाँव में एक नया दौर शुरू हुआ है.. बुजुर्ग के नाम पे अब सिर्फ बसावन चाचा टाइप के अप्रभावी लोग ही जिन्दा बचे हैं.. दो साल पहले किसी की मजाल कि कोई गाँव में मायेक पे गाना बजा दे पर अब लालजी रोज अपने छत पे गाना बजाते हैं.. पांच फीट की लम्बाई, बीच की मांग काढ़े सरसों के तेल में नहाये घने काले बाल, मूंछहीन साफ़ सुथरा चेहरा, हाफ बाजू की चेकदार टीशर्त और माता के दरबार की लाल छींट वाला गमछा लपेटे कांख में रेडियो दबाये फोन इन फर्माहिश सुन रहे जिस इंसान से आपका परिचय करवाया जा रहा है वो लालजी हैं..
इन्होने गाँव कभी नहीं छोड़ा पर आज भी अच्छे अच्छे बाहर रहने वाले लौंडों को अपने समसामयिक फ़िल्मी ज्ञान से पछाड़ देंगे.. ये कई मामलों में मेरे गाँव के क्रांतिवीर हैं.. कस्बा से डेग खरीद के लायें हैं, टेप भरवाने और बैटरी भरवाने हर हफ्ते ही क़स्बा जाते हैं.. पर पिछले कई दिनों से एक ही टेप हर शाम बजता है.. एक साइड दिलवाले और दुसरे साइड आशिकी का गाना है.. हर गाने में पहले डायलॉगबाजी होती है.. कोई मामा ठाकुर है.. कोई सपना है.. कोई अरुण है.. मुझे नहीं पता कि ये लोग कौन हैं.. पर इतना जरूर पता है कि बिरहा गाने का इस्टाइल अब बदल गया है.. "दहेज़ काण्ड" और "मोहनिया की बेटी" के साथ साथ अब अंग्रेजी गाना का दौर शुरू हो गया है.. दुआर पे कजरी गाने वाले या तो मर गये हैं या तो मरने वाले हैं.. ये दौर हर हाल में लालजी का है..
जब तक लालजी रंग, दिल का क्या कसूर और दिलवाले का कैसेट नहीं बजाते हैं तब तक मुसाफिर की पतोहू की दाल नही चूरती.. जब तक "कितना हसीन चेहरा, कितनी प्यारी बातें" वाली लाइन नहीं बजती सुदर्सन-बो की कंहतरी में जोरन नहीं जमता.. बियाह निबटा चुकी परन्तु बेगौना हुई नयी ब्याह्ताएं सांझ को गाना लिख लेती हैं, अगले दिन दुपहरिया में वही गाना गाते गाते अपने ससुरारी के लिए बेना बीनती हैं, परदा बुनती हैं.. "सातों जनम मैं तुझे" वाला गाना पूरा याद होने के बाद अतवरिया को पूरा विश्वास है कि वो गवना होते ही अपने पति की कोहबर वाली शिकायत दूर कर लेगी... मोहल्ले का एकमात्र कॉलेज स्टूडेंट हमारे बसावन चचा के कुलदीपक भी अपनी साइकिल के दोनों मोट्गार्ड पे दिलवाले का चित्रहार सटाए हैं.. मुसाफिर के घुरहू दुसरे आदमी हैं जिन्होंने लालजी से प्रेरणा लेकर मूंछों से स्वतंत्रता पायी है.. गवना के चार महिना बाद भी घुरहू चाहे भले ही पोखरी किनारे बैठ के मछरी ही मार रहे हों, वही लाल बुस्कर्ट और बेल्बत्तम पैंट पहने नज़र आयेंगे.. यहाँ हर लड़का अरुण है हर लड़की सपना.. पुरवैया चलने की कामना करते हुए एडमिन भी सांझ को कंधे पे लेवा डालकर बाँस की सीढ़ियों से छत पर जाता था.. लेवे को बिछाकर मधुर गीतों में खोया सितारे देखता कब सो जाता था कुछ नहीं पता...
सारांश
लालजी के एक अढ़ाई सौ का डेग मने साउंडबॉक्स ने पूरे मोहल्ले की फिजा बदल दी थी.. और हम एक आईफोन लेने के बाद सोचते हैं कोहड़े में तीर मार लिए

कमर में बम बाँधकर दौड़ाने की प्रतियोगिता

रियो ओलंपिक्स के लिए एक भी पाकिस्तानी क्वालीफाई नहीं हुआ, काश गोला फ़ेंक की जगह हथगोला फ़ेंक और 100 मीटर की रेस की जगह तार के नीचे से निकलने का खेल होता.. प्रतिक्रियास्वरूप पाकिस्तान ओलम्पिक एसोसिएशन ने कहा है कि हिम्मत है तो कमर में बम बाँधकर दौड़ाने की प्रतियोगिता कराओ.. वाया: ट्वीटर

गुरु आज भी प्रासंगिक है

जब डेढ़ रूपए महिना की फीस में भिन्न से लेकर दशमलव तक के कांसेप्ट क्लियर हो जाएँ और दस साल बाद आप उसी ज्ञान को अंग्रेजी में उड़ेल के अपनी पढ़ाई का खर्चा निकालें और पंद्रह साल बाद ऐसी जगह पे पहुँच जाएँ जहाँ आप स्कूलों में वृक्षारोपण हेतु बतौर मेहमान जाएँ, तो पीछे लौट के देखिएगा.. एक चेहरा नज़र आएगा जो आज भी आपके अंदर जीवित है, तुम्हारा गुरु आज भी प्रासंगिक है.

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ये गजब का गवर्नेंस है

गजब का गवर्नेंस है, विदेश में रह रहे भारतीयों को सरकार वीवीआईपी ट्रीटमेंट दे रही है, एक एक आदमी को वापस लाने के लिए स्वयं मंत्री, राजदूत और उच्चायुक्त कैमरे पे आ जा रहे हैं.. और यहाँ शनिवार को बजरंग बलि के मंदिर से निकलते ही पच्चीसों भीखमंगे घेर लेते हैं.. शायद ये किसी और देश के हैं, इनका विदेश मंत्री ट्विटर नहीं चलाता होगा, और अगर चलाता भी होगा तो क्या? भारत में ये सेफ तो हैं.. वैसे एक बात समझ में ये भी नहीं आती कि देश की आधे से अधिक जनता की फ़ूड सिक्यूरिटी जब सरकारी गल्ले पे दो रुपया किलो बिक रही है तो फिर ये भिखमंगे मंदिर में क्या अपना एनजीओ चलाने आते हैं...

मेरे वोट का अर्थ

मेरे वोट का ये अर्थ नहीं कि तुम्हारे कर्मों का गुणगान करूँ.. जबरजस्ती तुम्हारे हर कदम में एक सार्थकता साकार करू.. तुम बेहतर लगे थे.. मैंने तुम्हारी त्रुटियों को छुपाने के लिए नहीं उन्हें बताने के लिए वोट दिया है.. मुझे डर नहीं है कि जो वोट मैंने ढिंढोरा पीट के दिया था, आज उसी सरकार के बारे में कुछ प्रतिकूल कहूँ तो लोग क्या कहेंगे.. वो लोग क्या कहेंगे जिन्हें मैंने 16 मई को पूरे दिन फेसबुक में टैग करके चिढ़ाया था.. मेरे वोट की जवाबदेही सिर्फ मेरी है और मेरे प्रति है.. बसीठ सिंह अहीर और राधे पासवान मेरी वर्तमान सरकार के लिए दी गयी प्रतिक्रिया का स्नैपशॉट खींच के पुरानी वाली के साथ तुलना करेंगे यही न? करने दो.. पर मेरे वोटर होने का आशय ये नहीं कि वोट देके मैं आँखों में पट्टी बाँध लूँ.. मैं टैक्स देता हूँ.. देश चलाने में मेरी परोक्ष ही सही परंतु सक्रीय जिम्मेवारी है.. मेरे साल भर के टैक्स की रकम से कहीँ तीन परिवारों को पूरे साल भर का अंत्योदय अनाज मिलता है.. या यूपी का कोई पंजीकृत बेरोजगार उस पैसे से पूरे दो साल अपनी पल्सर की टंकी फुल करा रहा होगा.. या बीस एकड़ की जमीन पे किसान सब्सिडीकृत यूरिया का छिड़काव करते होंगे.. किसे पता क्या हो रहा होगा.. या वो पैसा किसी ठेकेदार की बचत बन के नीचे से ऊपर तक कितने ही हुक्ममरानों का बिस्तर गर्म कर रहा होगा किसे पता?
इतना पॉलिटिकली बायस्ड भी न हो जाओ कि अपने ही द्वारा चुने लोगों की कमियों को बताने भर का पुरुषार्थ भी शेष न रहे.. वरना अगली बार भी चौराहों पे सेम नारे लगाते नज़र आओगे, बस पोस्टरों में चेहरे बदले रहेंगे.. भक्त होना अच्छी बात है पर बीच बीच में कान खींच दिया करो..